पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। अब इससे जुड़े 24 साल पुराने गोपनीय दस्तावेज सामने आए हैं, जिनमें रूस और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई गंभीर बातचीत का खुलासा हुआ है। इन दस्तावेजों में पाकिस्तान के परमाणु प्रसार, सैन्य शासन और वैश्विक सुरक्षा पर मंडराते खतरे को लेकर गहरी चिंता जाहिर की गई थी।
बंद कमरों में हुई गंभीर बातचीत
साल 2001 से 2008 के बीच अमेरिका और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के बीच हुई बैठकों और फोन वार्ताओं में पाकिस्तान का नाम बार-बार सामने आया। दस्तावेजों के मुताबिक, 2005 की एक अहम बैठक में रूसी राष्ट्रपति ने बताया था कि ईरान में मिले यूरेनियम के तार पाकिस्तान से जुड़ते हैं। यह संकेत था कि परमाणु सामग्री का अवैध प्रसार हो रहा है।
सैन्य शासन और परमाणु नियंत्रण पर सवाल
रूसी पक्ष ने पाकिस्तान को लोकतांत्रिक देश के बजाय सैन्य शासन के रूप में पेश किया, जिसके पास परमाणु हथियार होना वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया। बातचीत में इस बात पर चिंता जताई गई कि अगर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, तो परमाणु तकनीक गलत हाथों में जा सकती है।
अमेरिका की स्वीकारोक्ति और दबाव की कहानी
अमेरिकी नेतृत्व ने माना कि उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति से परमाणु तस्करी का मुद्दा उठाया था। एक गुप्त नेटवर्क के उजागर होने के बाद पाकिस्तान पर दबाव भी बनाया गया, लेकिन यह भी स्वीकार किया गया कि अब तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आई है।
ए.क्यू. खान नेटवर्क की काली परछाईं
परमाणु तकनीक के अवैध सौदों का केंद्र रहा ए.क्यू. खान नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े परमाणु घोटालों में गिना जाता है। इसी नेटवर्क ने कई देशों तक संवेदनशील तकनीक पहुंचाई, जिससे वैश्विक संतुलन पर असर पड़ा।
भारत की पुरानी चिंता फिर चर्चा में
इन खुलासों के बाद भारत की सुरक्षा चिंताएं फिर उभरकर सामने आई हैं। भारत लगातार पाकिस्तान के परमाणु रिकॉर्ड और जिम्मेदारी पर सवाल उठाता रहा है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की मांग करता रहा है।