पाकिस्तान के हुक्मरान हमेशा से ही अपने सियासी फायदे के लिए मजहब का इस्तेमाल करते आए हैं। हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए जहां ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी और मंत्री धर्म के नाम पर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं। एक रिपोर्ट में इस रवैए की तीखी आलोचना की गई है। कहा गया है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और धार्मिक कट्टरपंथ ने दुनिया के कई हिस्सों में इस्लाम और आतंकवाद को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की धारणा को बल दिया है।
इस्लामाबाद की बेचैनी स्पष्ट दिखती है
भारत और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी भी पाकिस्तान को बेचैन कर रही है। ‘स्ट्रैट न्यूज ग्लोबल’ की इस सप्ताह प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (डीजीआईएसपीआर) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी की हालिया टिप्पणी से भारत-अफगानिस्तान संबंधों को लेकर इस्लामाबाद की बेचैनी स्पष्ट दिखती है। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि "अफगानिस्तान को भारत के साथ संबंध नहीं रखने चाहिए, क्योंकि भारत एक हिंदू राष्ट्र है।"
वंशावली भारतीयों से जुड़ी
रिपोर्ट के अनुसार, अफगान कृषि मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमारी ने जब कहा कि भारत और अफगानिस्तान ‘एक ही डीएनए साझा करते हैं’, तो चौधरी ने इस पर सवाल उठाया कि यदि अफगानों की वंशावली भारतीयों से जुड़ी है तो उन्हें मुस्लिम कैसे माना जा सकता है।
रिपोर्ट ने पाकिस्तान की मजहब के चयनात्मक इस्तेमाल को ‘गंभीर पाखंड’ बताते हुए कहा, " अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों की मौत को कथित तौर पर उसी धार्मिक कसौटी से नहीं देखा जाता।" काबुल के ओमिड ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर पर हुए हमले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें नागरिकों के मारे जाने और घायल होने की खबरों के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल ने संभावित युद्ध अपराध की जांच की मांग की थी।