शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले प्रधानमंत्री ने विपक्ष को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि अब संसद में शोर, आरोप या नारेबाजी नहीं—बल्कि ठोस काम और नीतिगत बहस की जरूरत है। उन्होंने विपक्ष से चुनावी पराजय की निराशा छोड़कर सकारात्मक सोच के साथ सत्र में भाग लेने की अपील की। प्रधानमंत्री का कहना था कि संसद देश के विकास का मार्ग तय करती है, इसलिए इसे राजनीतिक असंतोष जताने का मंच नहीं बनना चाहिए।
सत्र को विकास का इंजन बताया
प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाला शीतकालीन सत्र केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि ऐसा समय है जब देश के भविष्य को दिशा देने वाले फैसले लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि सदन में लिए गए निर्णय करोड़ों नागरिकों से जुड़े होते हैं, इसलिए हर दल को जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि देश निर्माण सकारात्मक सोच से होता है, न कि नकारात्मक टकराव से।
विपक्ष को दी ठोस भूमिका निभाने की सलाह
प्रधानमंत्री ने विपक्ष से कहा कि चुनावी हार की कसक को संसद की कार्यवाही पर हावी नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है, लेकिन संसद वह स्थान है जहां जनहित सर्वोपरि होना चाहिए। प्रधानमंत्री का मानना है कि चर्चा, सुझाव और तर्क—यही सदन की शक्ति हैं, और विपक्ष को इसे साबित करना चाहिए।
नारेबाजी नहीं, तथ्य आधारित चर्चा की जरूरत
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि सदन में ‘ड्रामा’ की जगह ‘डिलीवरी’ होनी चाहिए। उनका कहना था कि जनता चाहती है कि उसके प्रतिनिधि समस्याओं पर समाधान लेकर आएं, न कि समय नष्ट करें। उन्होंने नए सांसदों को अधिक अवसर देने की जरूरत पर भी जोर दिया, ताकि नई सोच और नई ऊर्जा भी संसद की प्रक्रिया को समृद्ध कर सके।
लोकसभा अध्यक्ष की अपील
सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ने भी उम्मीद जताई कि सभी सदस्य संवाद, सहयोग और सकारात्मक राजनीति के साथ सदन की परंपराओं को मजबूत करेंगे। उनका कहना था कि शीतकालीन सत्र तभी सफल माना जाएगा जब इसमें अधिकतम काम हो और कम से कम व्यवधान।