दुनिया की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था World Health Organization ने 1999 में औषधीय पौधों और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को एक जगह संकलित करने का बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया था, लेकिन 2010 में इसे अधूरा छोड़ दिया गया। इसके विपरीत, भारत में Patanjali Yogpeeth ने इसी दिशा में चुपचाप काम जारी रखा और वर्षों की मेहनत के बाद इस असंभव माने गए कार्य को पूरा कर दिखाया।
20 साल की रिसर्च से बना विशाल ज्ञानकोश
करीब दो दशकों की लगातार रिसर्च के बाद 2022 में “वर्ल्ड हर्बल इनसाइक्लोपीडिया” तैयार किया गया। इसमें 50,000 से अधिक औषधीय पौधों की पहचान, 2000 से ज्यादा जनजातियों के पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण, 964 हीलिंग प्रैक्टिसेस और 9 से अधिक चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया गया। 1.25 लाख से ज्यादा पन्नों में फैला यह ज्ञानकोश 2200 से अधिक स्रोतों पर आधारित है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े हर्बल डेटाबेस में से एक बनाता है।
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दून बुक फेस्टिवल में हुआ बड़ा ऐलान
Acharya Balkrishna ने देहरादून में आयोजित Dehradun Book Festival के दौरान बताया कि इस महाग्रंथ के 109 खंड पूरे हो चुके हैं। उन्होंने इसे सिर्फ किताब नहीं, बल्कि वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को सहेजने वाली एक ऐतिहासिक पहल बताया।
अब टेक दुनिया की नजर इस ज्ञान पर
डिजिटल और AI के दौर में Google जैसी दिग्गज कंपनी ने भी इस डेटा में रुचि दिखाई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस विशाल और प्रमाण आधारित जानकारी का उपयोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। यह संकेत है कि भारत का पारंपरिक ज्ञान अब वैश्विक तकनीकी मंच पर भी अपनी जगह बना रहा है।