पटना हाईकोर्ट की एक कानूनी टिप्पणी के बाद पूरे देश में नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मामला बिहार के बांका जिले में साल 2008 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक युवती ने स्टूडियो संचालक पर जबरदस्ती करने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस मामले में बलात्कार के प्रयास का अपराध साबित नहीं होता। इसके बाद अदालत की टिप्पणी को लेकर कानूनी और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग राय सामने आने लगी है।
आखिर मामला क्या था?
रिकॉर्ड के अनुसार युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो गई थी। आरोप है कि स्टूडियो संचालक ने पिता को बाहर भेजकर दरवाजा बंद कर लिया और युवती के साथ जबरदस्ती की। शिकायत में कहा गया कि आरोपी ने उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और छाती दबाई। युवती के शोर मचाने पर आरोपी वहां से भाग गया। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी माना था, लेकिन अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य भारतीय कानून के अनुसार बलात्कार के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और इसी आधार पर आरोपी को उस आरोप से राहत दी गई।
कानून में बलात्कार की परिभाषा क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 के अनुसार बलात्कार की कानूनी परिभाषा स्पष्ट रूप से तय की गई है। कानून के तहत महिला की इच्छा या वैध सहमति के बिना उसके निजी अंगों में लिंग का प्रवेश, किसी वस्तु या उंगली का प्रवेश कराना या निजी अंगों से जुड़े कुछ अन्य यौन कृत्य बलात्कार की श्रेणी में आते हैं। अदालतें किसी मामले का फैसला भावनाओं के बजाय कानून में लिखी गई परिभाषा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करती हैं। इसी वजह से अलग-अलग मामलों में अलग कानूनी धाराएं लागू हो सकती हैं।
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क्या हर जबरदस्ती रेप की श्रेणी में आती है?
ऐसा नहीं है कि किसी महिला के साथ की गई हर जबरदस्ती कानूनी अपराध नहीं होती। यदि कोई कृत्य कानून में तय बलात्कार की परिभाषा में नहीं आता, तब भी वह अन्य गंभीर आपराधिक धाराओं के तहत दंडनीय हो सकता है। जैसे महिला की गरिमा भंग करना, यौन उत्पीड़न, हमला या अन्य संबंधित अपराध। इसलिए किसी एक धारा में राहत मिलने का मतलब यह नहीं होता कि आरोपी सभी आरोपों से स्वतः मुक्त हो गया है।
कानून सहमति को कैसे देखता है?
भारतीय कानून में सहमति का मतलब महिला की स्पष्ट, स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई मंजूरी है। डर, धमकी, दबाव, धोखे या मजबूरी में दी गई सहमति को वैध नहीं माना जाता। यदि महिला नाबालिग है, मानसिक रूप से सक्षम नहीं है या नशे की हालत में है, तो उसकी कथित सहमति भी कानून की नजर में मान्य नहीं होती। अदालतें हर मामले में परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर यह तय करती हैं कि वास्तविक सहमति थी या नहीं।
फैसले पर क्यों छिड़ी बहस?
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि कानूनी जानकारों का कहना है कि अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और कानून की परिभाषा के आधार पर टिप्पणी की है। ऐसे मामलों में अदालत का काम यह तय करना होता है कि आरोप संबंधित कानूनी धारा के तहत साबित होते हैं या नहीं। यही कारण है कि यह मामला केवल एक फैसले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बलात्कार की कानूनी परिभाषा, सहमति और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।