महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर दिखा दिया है। कभी सत्ता और रणनीति का मजबूत केंद्र माने जाने वाले शरद पवार के लिए ये नतीजे किसी झटके से कम नहीं हैं। 2000 से ज्यादा वार्डों के रुझानों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर नजर आ रहा है, जबकि दूसरी ओर भतीजे अजित पवार ने स्थानीय स्तर पर कहीं ज्यादा मजबूती दिखाई है।
2000 वार्डों में शरद पवार की पार्टी का सिमटा जनाधार
नगर निगम चुनावों की मतगणना के शुरुआती साढ़े तीन घंटे में ही तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई। राज्यभर में अब तक सामने आए करीब 2000 वार्डों के रुझानों में एनसीपी-एसपी को महज 24 सीटों पर ही बढ़त मिलती दिख रही है। यह आंकड़ा उस पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक है, जो कभी महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी मानी जाती थी।
मुंबई से लेकर बड़े शहरों तक खाता खोलना भी मुश्किल
महाराष्ट्र के सबसे बड़े और अहम नगर निगम मुंबई में पार्टी की हालत सबसे ज्यादा चिंताजनक नजर आई। 227 वार्डों वाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका में एनसीपी-एसपी केवल एक सीट पर आगे चल रही है। पुणे, कल्याण, नवी मुंबई, उल्हासनगर, वसई-विरार जैसे प्रमुख शहरी इलाकों में पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया है, जो शहरी मतदाताओं से दूरी को साफ दिखाता है।
कई शहरों में पूरी तरह सिमटी मौजूदगी
राज्य के कई अहम शहरों में शरद पवार की पार्टी को एक भी वार्ड में बढ़त नहीं मिल सकी। जलगांव, धुले, इचलकरंजी, नांदेड़, परभणी, जालना, चंद्रपुर, अमरावती, सोलापुर, कोल्हापुर, नासिक और पनवेल जैसे शहरों में पार्टी पूरी तरह पिछड़ती नजर आई। ठाणे और मीरा-भायंदर में जरूर 4-4 सीटों पर बढ़त दिखी, लेकिन यह कुल प्रदर्शन को संभालने के लिए काफी नहीं रही।
चाचा से पांच गुना आगे भतीजा अजित पवार
जहां शरद पवार का गढ़ कमजोर पड़ता दिख रहा है, वहीं उनके भतीजे अजित पवार ने स्थानीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है। रुझानों के मुताबिक अजित पवार की पार्टी करीब 114 वार्डों में आगे चल रही है। यानी वे अपने चाचा की पार्टी से करीब पांच गुना ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं, जो एनसीपी के भीतर बदले शक्ति संतुलन की ओर इशारा करता है।
एमएनएस की तुलना में भी कमजोर रहा प्रदर्शन
दिलचस्प बात यह है कि इस चुनाव में एमएनएस का प्रदर्शन भी एनसीपी-एसपी से बेहतर माना जा रहा है। पूरे राज्य में एमएनएस के 17 उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं। कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ रही एनसीपी-एसपी के लिए ये नतीजे संगठनात्मक कमजोरी और रणनीतिक चूक पर आत्ममंथन की जरूरत को रेखांकित करते हैं।