Peepal Tree Religious Importance: आपने गांव की गलियों से लेकर शहर के पुराने मंदिरों और सड़क किनारे तक पीपल के पेड़ जरूर देखे होंगे। यह पेड़ जितना विशाल और छायादार होता है, भारतीय परंपरा में इसका धार्मिक महत्व भी उतना ही गहरा है। पीढ़ियों से लोग पीपल को श्रद्धा की नजर से देखते आए हैं और इसके नीचे पूजा-पाठ करने की परंपरा आज भी कई जगहों पर कायम है। हिंदू मान्यताओं में पीपल को पवित्र वृक्षों में प्रमुख स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस वृक्ष में देवी-देवताओं का वास माना जाता है। यही कारण है कि कई लोग पीपल के आसपास का वातावरण सकारात्मक और आध्यात्मिक मानते हैं। भगवान विष्णु से जुड़ा है पीपल पीपल को भगवान विष्णु के स्वरूप से जोड़ने वाली मान्यता काफी पुरानी है। भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रमुख विभूतियों का वर्णन करते हुए वृक्षों में अश्वत्थ यानी पीपल को अपना स्वरूप बताया है।
गीता के दसवें अध्याय के 26वें श्लोक में कहा गया है-
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः
इसका भावार्थ है कि वृक्षों में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अश्वत्थ यानी पीपल हैं। इसी धार्मिक संदर्भ के चलते पीपल के पेड़ के प्रति लोगों की आस्था और बढ़ गई। शनिवार को पीपल के नीचे दीपक जलाने की परंपरा पीपल की पूजा के लिए शनिवार का दिन भी विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यता में इसका संबंध शनिदेव से जोड़ा जाता है। ऐसी परंपरा है कि शनिवार की शाम पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है। कई श्रद्धालु ऐसा खासतौर पर उस समय करते हैं जब वे शनि से जुड़ी परेशानियों या साढ़ेसाती जैसी ज्योतिषीय स्थितियों को लेकर चिंतित होते हैं।
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जल अर्पित करने और परिक्रमा की परंपरा
पीपल की पूजा में जल चढ़ाने की परंपरा भी काफी प्रचलित है। लोग सुबह स्नान आदि के बाद पेड़ की जड़ में जल अर्पित करते हैं। इसके बाद उसकी परिक्रमा करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।