मध्यपूर्व में जारी संकट और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने तेल कंपनियों को दी जा रही अतिरिक्त वित्तीय सहायता रोकने का फैसला किया है। सूत्रों के मुताबिक सरकार अब तक इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये की राहत दे चुकी है। लेकिन अब वित्त मंत्रालय का मानना है कि किसी एक क्षेत्र को लगातार इतनी बड़ी सहायता देना संभव नहीं है।
घाटे में चल रही हैं तेल कंपनियां
सरकारी मदद और हालिया मूल्य वृद्धि के बावजूद तेल कंपनियों की स्थिति आसान नहीं हुई है। जानकारी के अनुसार कंपनियां आज भी रोजाना करीब 652 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की आपूर्ति लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ नहीं डाला गया है। यही वजह है कि कंपनियों के वित्तीय दबाव में कमी नहीं आई है।
रसोई गैस पर सबसे ज्यादा दबाव
एलपीजी के मामले में स्थिति और गंभीर बताई जा रही है। एक घरेलू सिलेंडर की आपूर्ति लागत 1600 से 1700 रुपये तक पहुंच चुकी है। हाल ही में कीमत बढ़ाने के बाद भी कंपनियों को हर सिलेंडर पर 600 से 700 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। अनुमान है कि घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी 60 हजार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच सकती है।
ये भी पढ़ें : अब Metro-Bus से ऑफिस जाओ, सरकार देगी एक्स्ट्रा पैसा, Delhi के कर्मचारियों के लिए बड़ा ऐलान
मध्यपूर्व संकट ने बढ़ाई परेशानी
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और एलपीजी विदेशों से आयात करता है। मध्यपूर्व में तनाव और समुद्री आपूर्ति मार्गों पर असर के कारण आयात महंगा हो गया है। वैकल्पिक स्रोतों से खरीद और लंबी दूरी की ढुलाई ने भी लागत बढ़ा दी है। इसी वजह से पिछले कुछ समय में ईंधन कीमतों पर दबाव लगातार बना हुआ है।
महंगाई पर बढ़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल कंपनियों को आगे कोई अतिरिक्त राहत नहीं मिलती और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में और बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसका सीधा असर परिवहन, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा के खर्चों पर पड़ सकता है।
आरबीआई ने भी जताई चिंता
भारतीय रिजर्व बैंक पहले ही ऊर्जा कीमतों को लेकर चिंता जता चुका है। केंद्रीय बैंक ने विकास दर का अनुमान घटाया है और महंगाई के अनुमान को बढ़ाया है। ऐसे में आने वाले दिनों में तेल की कीमतें केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए अहम मुद्दा बनी रह सकती हैं।