
हिंदू धर्म में पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) को सबसे पवित्र काल माना गया है। यह काल हर वर्ष 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों का स्मरण कर श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितरों की तृप्ति के बिना कोई भी कर्म पूर्ण नहीं होता। अगर इस अवधि में कुछ गलतियां हो जाएं तो ‘त्रिदोष’ यानी देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का दोष लगता है, जिससे जीवन में कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं।
क्या है त्रिदोष?
त्रिदोष का अर्थ है तीन प्रमुख ऋण जिन्हें हर मनुष्य को अपने जीवन में चुकाना होता है। पहला है देव ऋण यानी देवताओं और प्रकृति का ऋण, दूसरा है ऋषि ऋण यानी वेद-शास्त्र और ज्ञान देने वाले ऋषियों का ऋण और तीसरा है पितृ ऋण यानी पूर्वजों का ऋण। यदि कोई व्यक्ति इनका पालन न करे या गलत आचरण करे तो जीवन में त्रिदोष उत्पन्न हो जाता है जिससे संतान प्राप्ति में बाधा, आर्थिक संकट और मानसिक कष्ट बढ़ जाते हैं।
पितृपक्ष में भूलकर भी न करें ये 3 काम
1. मांगलिक कार्य न करें
पितृपक्ष को शोक और स्मरण का काल माना जाता है। इस दौरान विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, सगाई या कोई भी शुभ मांगलिक कार्य करना वर्जित है। शास्त्रों के अनुसार, ऐसा करने से पितर अप्रसन्न हो जाते हैं और वंशवृद्धि पर रोक लग सकती है।
नमक, तेल और झाड़ू खरीदने से बचें
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में नमक, सरसों का तेल और झाड़ू खरीदना अशुभ है। इन चीजों का लेन-देन करने से घर में दरिद्रता और रोग प्रवेश करते हैं। माना जाता है कि यह सीधा-सीधा पितृ दोष को बढ़ाता है और संतान प्राप्ति में भी बाधा डालता है।
मांस-मदिरा और तामसिक भोजन से बचें
पितृपक्ष में सात्त्विक जीवनशैली का पालन जरूरी है। इस दौरान मांसाहार, मदिरापान या तामसिक भोजन करना पितरों का अपमान माना जाता है। इससे पितरों की आत्मा को कष्ट होता है और संतान सुख से जुड़ी रुकावटें बढ़ जाती हैं।
संतान प्राप्ति से क्यों जुड़ा है पितृपक्ष?
धर्मग्रंथों में संतान को पितरों का वंश आगे बढ़ाने वाला कहा गया है। अगर पितृ नाराज हो जाएं तो वे आशीर्वाद की जगह अवरोध खड़ा कर देते हैं। इसीलिए पितृपक्ष में शुद्ध आचरण, श्राद्ध और दान का पालन करने से पितृदेव प्रसन्न होते हैं और संतान प्राप्ति में आ रही अड़चनें दूर होती हैं।