
पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है और इन दिनों ने गया में पिंडदान का महत्व बढ़ जाता है। बिहार के गया का संबंध रामायण और महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। पिंडदान का क्या महत्व और माता सीता ने किन लोगों को श्राप दिया था। इसके पीछे की क्या है खास वजह चलिए जानते हैं। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए देशभर से लाखों श्रद्धालु बिहार के गया पहुंचते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में गया को “मोक्षस्थली” कहा गया है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से 108 कुल और सात पीढ़ियों तक के पितरों का उद्धार होता है। वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में गया के पिंडदान का विशेष उल्लेख मिलता है।
गयासुर और गया की उत्पत्ति कैसे हुई?
कथा है कि गयासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा था कि उसके शरीर के दर्शन मात्र से मनुष्य पापमुक्त हो जाए। धीरे-धीरे लोग पाप करने लगे और उसके दर्शन से मुक्त होने लगे। इससे स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ गया। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने गयासुर से यज्ञ के लिए उसका शरीर मांगा। यज्ञ पूर्ण होने के बाद उन्होंने गयासुर को मोक्ष देकर आशीर्वाद दिया कि जहां-जहां उसका शरीर फैलेगा, वह स्थान पवित्र होगा और पिंडदान से पितरों को मुक्ति मिलेगी। यही स्थान आज की गया नगरी कहलाता है।
रामायण से जुड़ा खास प्रसंग
रामायण के अनुसार, भगवान राम और माता सीता ने यहीं फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। महाभारत काल में भी पांडवों ने गया आकर अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म संपन्न किया था। गया नगरी की उत्पत्ति से जुड़ी कथा भी उतनी ही रोचक है। कहा जाता है कि यहां गयासुर नामक असुर ने तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि उसका शरीर इतना पवित्र हो जाए कि उसके दर्शन मात्र से लोग पाप मुक्त हो जाएं। धीरे-धीरे लोग पाप कर उसके दर्शन से मुक्त होने लगे। इससे स्वर्ग-नरक का संतुलन बिगड़ गया।
माता सीता का श्राप
पिंडदान के समय सीता ने फल्गु नदी, गाय, केतकी फूल और वटवृक्ष को साक्षी बनाया। जब राम लौटे तो उन्होंने सीता की बात पर विश्वास नहीं किया। सीता ने गवाह बुलाए, लेकिन फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोला। केवल वटवृक्ष ने सच कहा। इस पर माता सीता ने क्रोधित होकर तीनों को श्राप दिया।
फल्गु नदी को श्राप दिया कि वह जलविहीन हो जाएगी।
गाय को श्राप मिला कि पवित्र होकर भी वह जूठन खाएगी।
केतकी फूल को श्राप दिया कि वह कभी देवी-देवताओं की पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा।
वटवृक्ष को सत्य बोलने पर दीर्घायु और पूजनीय होने का आशीर्वाद मिला।
आज भी इन श्रापों का प्रमाण दिखाई देता है। फल्गु नदी सूखी रहती है, पिंडदान रेत से होता है, गाय पूजनीय है लेकिन जूठन खाती है और केतकी का फूल किसी पूजा में नहीं चढ़ाया जाता।
महाभारत में भी गया का उल्लेख मिलता है। पांडवों ने भी यहीं पर अपने पितरों का श्राद्ध और पिंडदान किया था। तभी से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है।
पितृपक्ष में लगता है मेला
हर साल पितृपक्ष के दौरान गया में विशाल मेला लगता है। लाखों श्रद्धालु यहां पिंडदान और तर्पण के लिए जुटते हैं। यह स्थल केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी पवित्र है। समीप स्थित बोधगया वह स्थान है, जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति की थी। इस कारण गया न केवल मोक्षस्थली है बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का केंद्र भी है।