
पितृ पक्ष का हर दिन पूर्वजों की स्मृति और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए विशेष होता है, लेकिन षष्ठी तिथि का अपना एक अलग ही महत्व होता है। पितृ पक्ष की षष्ठी तिथि उन पितरों के लिए समर्पित होती है जिनका देहावसान षष्ठी तिथि को हुआ था। 2025 में यह दिन पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए खास तौर पर मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पितरों की आत्मा प्रसन्न होती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देकर समस्त कष्टों को दूर करते हैं।
क्या करें
इस दिन श्राद्ध की शुरुआत प्रातः स्नान करके पवित्रता के साथ होती है। पवित्र स्थान पर काले तिल, कुश और जल से पितरों को तर्पण अर्पित किया जाता है। इसके बाद पिंडदान किया जाता है जिसमें पक्वान्न, खीर, चावल, दाल, और मौसमी फल शामिल किए जाते हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से श्राद्ध करता है, उसके कुल में दरिद्रता, रोग और वैरभाव दूर हो जाते हैं।
पितरों की आत्मा को शांति
इस पवित्र तिथि पर पांच ऐसे कार्य हैं जिन्हें करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। पहला, तर्पण अवश्य करें – यह जल अर्पण का कार्य है जो पितरों की आत्मा को शांति देता है। दूसरा, ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं – यह कार्य पितरों को भोजन कराने के समान माना जाता है। तीसरा, दान दें – वस्त्र, अन्न, तांबा, चांदी, या दक्षिणा का दान इस दिन विशेष पुण्यफल प्रदान करता है। चौथा, गाय, कुत्ते, कौवे को भोजन कराएं – इन्हें पितरों का प्रतिनिधि माना गया है और इनकी सेवा से पितृ तृप्त होते हैं। और पांचवां, ध्यान और पितरों का स्मरण करें – एक शांत मन से अपने पितरों के नाम का उच्चारण करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।
आत्मिक जुड़ाव
पितृ पक्ष की षष्ठी केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक आत्मिक जुड़ाव का अवसर है। यह दिन हमें अपने मूल, अपनी परंपराओं और परिवार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की प्रेरणा देता है। जब हम श्रद्धा से श्राद्ध करते हैं, तो न केवल पितर तृप्त होते हैं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी सुखी और समृद्ध बनती हैं।