प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से हटने और फिर कुछ घंटों बाद दोबारा बहाल होने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा एक बार फिर चर्चा में है। सरकार के कड़े रुख के बाद मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों ने भारत सरकार से मुलाकात कर खेद जताया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर सोशल मीडिया कैसे राजनीति और चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा मंच बन गया।
वीडियो हटने पर क्यों बढ़ा विवाद?
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हट गया था। मेटा ने इसे तकनीकी गलती बताया, लेकिन सरकार ने इस स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए। बाद में कंपनी के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय आईटी मंत्री और अधिकारियों से मुलाकात कर कहा कि वीडियो गलती से हटा था। साथ ही कुछ अन्य कंटेंट मॉडरेशन से जुड़े मामलों पर भी खेद जताया गया।
सोशल मीडिया से चुनावी राजनीति तक का सफर
भारत में शुरुआती दौर में फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिर्फ लोगों को जोड़ने का माध्यम माने जाते थे। लेकिन समय के साथ राजनीतिक दलों ने इन्हें प्रचार, जनसंपर्क और मतदाताओं तक सीधे पहुंचने के बड़े माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसके बाद चुनावी प्रचार का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट होने लगा।
2014 के बाद बदली चुनावी रणनीति
2014 के आम चुनाव के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया। इसके बाद फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म राजनीतिक अभियानों का अहम हिस्सा बन गए। डिजिटल प्रचार, वीडियो, लाइव संदेश और सोशल मीडिया कैंपेन चुनावी रणनीति का प्रमुख माध्यम बनते चले गए।
अब एल्गोरिद्म और कंटेंट मॉडरेशन पर बहस
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिद्म, कंटेंट मॉडरेशन, फेक न्यूज, डीपफेक और पेड प्रमोशन जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार का कहना है कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी सिर्फ कंटेंट होस्ट करने तक सीमित नहीं हो सकती, जबकि कंपनियां अपने नियमों और तकनीकी प्रक्रियाओं का हवाला देती रही हैं।
इसे भी पढ़ें : WTC पॉइंट्स टेबल में पाकिस्तान को बड़ा फायदा, जीत के बाद एक स्थान ऊपर, फिर भी टीम इंडिया से पीछे
सोशल मीडिया की भूमिका पर बढ़ी निगरानी
आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीति, चुनावी प्रचार और जनमत निर्माण का बड़ा मंच बन चुका है। यही वजह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, पारदर्शिता और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर सरकार, राजनीतिक दलों और टेक कंपनियों के बीच बहस लगातार तेज होती जा रही है।