उत्तर प्रदेश की राजनीति में 4 जून 2024 का लोकसभा चुनाव परिणाम बड़ा मोड़ साबित हुआ। चुनाव से पहले ज्यादातर अनुमान भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की बड़ी जीत की ओर इशारा कर रहे थे, लेकिन नतीजों में समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ प्रदेश में सबसे अधिक सीट जीतने वाली पार्टी बनी। भाजपा 33 सीटों पर रह गई। 2019 में भाजपा ने प्रदेश की 80 में से 62 सीटें जीती थीं। इस परिणाम के बाद सपा ने अपने पुराने मुस्लिम-यादव आधार से आगे बढ़कर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर जोर बढ़ाया। 2024 में सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा। उसके उम्मीदवारों में यादवों की संख्या पांच रही, जबकि चार मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे गए। अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों को भी बड़ी हिस्सेदारी दी गई।
2024 के प्रयोग को विधानसभा में विस्तार
लोकसभा परिणाम के बाद सपा अब उसी सामाजिक समीकरण को विधानसभा चुनाव में व्यापक रूप देने की तैयारी में है। पार्टी सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की योजना पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक करीब 14 सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को उतारने की तैयारी है। 2024 में भी सपा ने मेरठ और फैजाबाद जैसी सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारे थे। फैजाबाद से अवधेश प्रसाद चुनाव जीते, जबकि मेरठ में सुनीता वर्मा मामूली अंतर से हार गईं। इसके साथ ही अखिलेश यादव ने ब्राह्मण समाज तक पहुंच बढ़ाने के संकेत दिए हैं। उन्होंने हाल में कहा कि ‘पीडीए’ में ‘पी’ का अर्थ पिछड़ा के साथ पंडित भी है। यानी सपा अपने सामाजिक गठजोड़ में अगड़ी जातियों के एक प्रभावशाली वर्ग को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है।
भाजपा के लिए चुनौती क्या
2024 के परिणाम ने गैर-यादव पिछड़े और दलित मतों को लेकर दोनों प्रमुख दलों की रणनीति बदल दी है। सपा इन वर्गों में अपनी पहुंच बनाए रखने के साथ यादव-मुस्लिम आधार को भी कायम रखना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समर्थन को बनाए रखने और विपक्ष के नए गठजोड़ की काट तैयार करने की चुनौती है। सपा की रणनीति केवल टिकट वितरण तक सीमित नहीं है। पार्टी भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी कर रही है। आगरा और गोरखपुर जैसे क्षेत्रों में कार्यक्रमों के जरिये पिछड़ों, दलितों, निषादों, कुर्मियों और ब्राह्मणों तक पहुंच बनाने की योजना सामने आई है। 2027 का मुकाबला इसलिए केवल सत्ता और विपक्ष की पारंपरिक लड़ाई नहीं रहेगा। दोनों दलों के लिए असली परीक्षा अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़कर रखने और उन्हें चुनावी समर्थन में बदलने की होगी।
2024 के नतीजों ने बदली तस्वीर
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में सपा ने 37, भाजपा ने 33, कांग्रेस ने छह और राष्ट्रीय लोकदल ने दो सीटें जीतीं। सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसका मत प्रतिशत करीब 33.6 रहा, जबकि भाजपा का करीब 41.4 प्रतिशत था। सीटों के लिहाज से सपा आगे रही, लेकिन मत प्रतिशत में भाजपा उससे आगे थी। यही अंतर 2027 के लिए दोनों दलों की सामाजिक रणनीति को महत्वपूर्ण बनाता है।