Meerut Dalit massacre: मेरठ के कपसड़ गांव में दलित महिला की हत्या और उसकी बेटी के अपहरण की घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर झकझोर दिया है। इस गंभीर वारदात के बाद जहां अलग-अलग दल अपनी भूमिका निभाते दिख रहे हैं, वहीं दलित राजनीति में नेतृत्व को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है। मायावती की सीमित प्रतिक्रिया, अखिलेश यादव की सक्रियता और चंद्रशेखर आजाद की सीधी दखल ने सियासी समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।
सवालों के घेरे में BSP
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने इस घटना पर सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया दी, लेकिन खुद मौके पर न जाना कई सवाल खड़े कर रहा है। लंबे समय से दलित राजनीति की सबसे बड़ी पहचान रहीं मायावती की रणनीतिक चुप्पी को उनके समर्थक अनुशासन मानते हैं, जबकि आलोचक इसे जमीनी जुड़ाव की कमी बता रहे हैं। इस रवैये से BSP के भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अखिलेश यादव की सक्रियता
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मामले में सक्रिय रुख अपनाया है। पार्टी के नेता और प्रतिनिधि पीड़ित परिवार से संपर्क में हैं। अखिलेश इसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की जा सके।
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चंद्रशेखर आजाद की एंट्री
आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद खुद पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे हैं। उन्होंने फोन पर बात कर न्याय का भरोसा दिलाया है। उनका यह कदम दलित समुदाय में उनकी बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है। जमीनी स्तर पर मौजूदगी और स्पष्ट बयानबाजी उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिला रही है।
नई दलित राजनीति
भीम आर्मी से लेकर आजाद समाज पार्टी तक का चंद्रशेखर का सफर विवादों और संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन हालिया घटनाएं उन्हें दलित राजनीति के नए चेहरे के रूप में पेश कर रही हैं। 2024 की लोकसभा जीत के बाद उनका आत्मविश्वास और प्रभाव दोनों बढ़े हैं। मेरठ की यह घटना तय कर सकती है कि आने वाले समय में दलित राजनीति का केंद्र कौन बनेगा।