Pollution vs education: दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के बीच स्कूलों को बंद रखने या खोलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत के सामने यह सवाल रखा गया कि GRAP के तहत स्कूल बंद करने का फैसला बच्चों की पढ़ाई और सेहत, दोनों पर कैसे असर डालता है। सुनवाई के दौरान यह दलील भी दी गई कि स्कूल बंद होने से गरीब बच्चों को ज्यादा नुकसान होता है, जबकि ऑनलाइन या हाइब्रिड पढ़ाई का विकल्प हर किसी के पास नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे फैसले अदालत नहीं बल्कि विशेषज्ञों और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। कोर्ट ने कहा कि वह नीति निर्धारण की भूमिका नहीं निभा सकती और बच्चों की सेहत को प्राथमिकता देना जरूरी है।
गरीब बच्चों की दलील पर अदालत की राय
वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि स्कूल बंद होने से गरीब परिवारों के बच्चे मिड-डे मील जैसी जरूरी सुविधाओं से वंचित हो जाते हैं। इस तर्क पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हाइब्रिड मॉडल लागू होने पर कामकाजी माता-पिता के लिए बच्चों को स्कूल भेजने का विकल्प खुल सकता है, लेकिन यह फैसला भी प्रशासनिक आकलन पर निर्भर करता है। कोर्ट ने माना कि प्रदूषण की गंभीर स्थिति में बच्चों को स्कूल भेजना अपने आप में जोखिम हो सकता है। इसलिए केवल सामाजिक या आर्थिक आधार पर अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
हाइब्रिड मॉडल और कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि GRAP दिशा-निर्देश हाइब्रिड पढ़ाई की अनुमति देते हैं, जबकि दिल्ली सरकार ने कक्षा 5 तक के स्कूल पूरी तरह बंद रखने का निर्णय लिया है। केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि यह कदम बच्चों की सेहत को देखते हुए उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कक्षा 5 तक स्कूल खोलने या हाइब्रिड कक्षाएं अनिवार्य करने का आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रदूषण जैसी स्थिति में दीर्घकालिक समाधान पर काम करना जरूरी है, ताकि बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि छुट्टियों के बाद हालात बेहतर होंगे और सरकार स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाएगी।