प्रयागराज, प्रख्यात आलोचक प्रो. राजेन्द्र कुमार का निधन हो गया। उन्होंने गुरुवार की देर रात अपने निवास में अंतिम सांस ली। उन्होंने अपने लेखन के जरिए लोगों को एक प्रगतिशील दृष्टि दी है। अत्यंत सहज, सौम्य और संबंधों का निर्वाह करने वाले थे। उनमें रिश्तों की संवेदना और उसका निर्वहन करने का मानवीय विचार बहुत दृढ़ था. प्रोफेसर राजेंद्र कुमार 1943 में कानपुर में जन्में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। आगे चलकर इवि के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। साहित्य में सृजन के आयाम और विज्ञानवादी दृष्ट, इलाचन्द्र जोशी (मोनोग्राफ) इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं.
साही के बहाने समकालीन रचनाशीलता पर एक बहस
प्रेमचन्द की कहानियाँ: परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य, स्वाधीनता की अवधारणा और निराला
प्रमुख कृतियाँ : 'ऋण गुणा ऋण' (कविता-संग्रह) उ. प्र. हिंदी संस्थान द्वारा 1978 में पुरस्कृत। 'अनंतर तथा अन्य कहानियाँ' (कहानी-संग्रह), 'प्रतिबद्धता के बावजूद' (आलोचनात्मक लेखों का संग्रह), 'इलाचंद्र जोशी' (साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ़), 'शब्द-घड़ी में समय' (निबंध-संग्रह) ।
संपादन : 'साही के बहाने समकालीन रचनाशीलता पर एक बहस', 'आलोचना का विवेक' (देवीशंकर) अवस्थी पर एकाग्र), 'अमन बनाम आतंक', 'स्वाधीनता की अवधारणा और निराला', 'प्रेमचंद की कहानियाँ : परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य', 'मुक्तिबोध और 'अंधेरे' में'।
इलाहाबाद से अभिप्राय' (साहित्यिक पत्रिका) का 1981 से संपादन। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका 'बहुवचन' का भी 2009-10 में संपादन किया।
प्रो राजेंद्र कुमार साहित्यिक संस्था जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष भी रहे। जब 75 वर्ष के हुए तब उन्होंने कहा था कि 'मैं कोई परमहंस नहीं हूं। अभी में 75 पार हुआ हूँ, भवसागर नहीं। बहुत कुछ लिखना बाकी है.