Premanand Maharaj: अध्यात्म में ‘नाम जप’ को मुक्ति का एक सरल और प्रभावी मार्ग बताया गया है। लेकिन कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या मोक्ष पाने की इच्छा रखना और भगवान का नाम जपना किसी तरह का स्वार्थ तो नहीं? प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने इस प्रश्न का बड़ा ही सुंदर और सारगर्भित उत्तर दिया है। उनका मानना है कि भक्ति में स्वार्थ का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि नाम जप आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सहज माध्यम है।
मोक्ष की इच्छा स्वार्थ नहीं, आत्मा की पुकार है
प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि मोक्ष किसी भौतिक लाभ की तरह नहीं होता जिसे पाने के पीछे लोभ या स्वार्थ हो। यह तो आत्मा की जन्म-जन्मांतर की थकान को समाप्त करने का मार्ग है। जब आत्मा अपने मूल की ओर लौटने की चाह रखती है, तो उसे स्वार्थ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्यास कहा जाता है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति मोक्ष के लिए नाम जप करता है, तो वह किसी लालच के कारण नहीं, बल्कि अपनी आत्मिक उन्नति के लिए करता है।
नाम जप से मन और जीवन दोनों शुद्ध होते हैं
महाराज का कहना है कि नाम जप केवल मोक्ष का साधन नहीं, बल्कि मन को शांत रखने और जीवन में सद्बुद्धि जागृत करने का तरीका है। जब व्यक्ति नियमित रूप से प्रभु का स्मरण करता है, तो उसके भीतर से नकारात्मकता, दुख और भय कम होने लगता है। जीवन में संतुलन आता है और मन धीरे-धीरे निर्मल होता जाता है। ऐसे में नाम जप को स्वार्थ कहना वैसे ही है जैसे दवा को स्वास्थ्य पाने की लालसा कहना—दोनों ही आवश्यक और प्राकृतिक हैं।
भक्ति का मार्ग ‘लेने’ से अधिक ‘समर्पण’ का है
महाराज यह भी समझाते हैं कि सच्ची भक्ति कभी भी ‘मैं क्या पाऊं’ से शुरू नहीं होती। भक्ति का आधार होता है प्रेम, विश्वास और समर्पण। जब व्यक्ति भगवान का नाम लेता है, तो उसके मन में धीरे-धीरे ‘मैं’ खत्म होने लगता है और केवल भाव शेष रह जाते हैं। यही भाव मुक्ति का कारण बनते हैं। इसलिए नाम जप में स्वार्थ की जगह शुद्ध निष्ठा और प्रेम का भाव रहता है।
नाम जप आत्मा को अपने स्रोत से जोड़ता है
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मनुष्य की आत्मा अनादि काल से परमात्मा का अंश है। नाम जप उस डोरी की तरह है जो हमें फिर से अपने मूल प्रकाश से जोड़ता है। यह वह साधन है जो हर व्यक्ति कर सकता है—बिना किसी विधि-विधान, खर्च या विशेष योग्यता के। जब नाम जप आत्मा में स्थिर हो जाता है, तो मोक्ष अपने आप प्राप्त होता है। इसमें स्वार्थ नहीं, बल्कि आत्मा की स्वाभाविक यात्रा शामिल होती है।