
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच एक समिति कर रही है। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायधीश के पास संसद की ओर से पद से हटाए जाने से बचने को लेकर इस्तीफा देना का एकमात्र विकल्प है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंगलवार को लोकसभा में जानकारी दी कि जस्टिस वर्मा को पद से हटाने का प्रस्ताव समिति जांच रिपोर्ट को लेकर अभी लंबित है।
जांच रिपोर्ट को जल्द सौंपने वाली है समिति
समिति इस केस की जांच रिपोर्ट को जल्द सौंपने वाली है। उन्होंने बताया कि 146 लोकसभा सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने को लेकर प्रस्ताव दिया। इस दौरान भाजपा सांसद रवि शंकर प्रसाद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित अन्य लोग शामिल हैं।
फैसला जस्टिस वर्मा को लेना है
मामले से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जस्टिस वर्मा मौखिक रूप से भी घोषणा करते हैं कि वे पद छोड़ रहे हैं तो उनके इस बयान को इस्तीफा माना जाएगा। अब यह फैसला जस्टिस वर्मा को लेना है। हाईकोर्ट के जज को मिलने वाली पेंशन के साथ अन्य सुविधाओं के हकदार होंगे। अगर संसद उन्हें पद से हटाती हे तो उन्हें इन सुविधाओं का लाभ नहीं मिलने वाला है। गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से गठित जांच समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्त अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य को शामिल किया है।
किसी से इजाजत नहीं मिलती है
इस्तीफा संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा लिख सकते हैं। जज को इस्तीफे के लिए किसी से इजाजत नहीं मिलती है। सामान्य इस्तीफा पर्याप्त होता है। न्यायमूर्ति इस्तीफे की तिथि को तय कर सकते हैं। इस दिन से वे कार्य नहीं करेंगे।