मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री पुंडरीक गोस्वामी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। वजह है बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की पदयात्रा में उनकी सक्रिय भागीदारी। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं, जिसमें वे बाबा बागेश्वर और जया किशोरी के साथ दिखाई दे रहे हैं। 7 से 16 नवंबर तक दिल्ली से वृंदावन तक चली सनातन एकता पदयात्रा में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। पुंडरीक गोस्वामी वृंदावन के सप्त देवालयों में से एक मंदिर के सेवायत हैं और दुनिया भर के भक्तों के बीच अपनी कथा शैली के लिए विशेष पहचान रखते हैं।
पांच पीढ़ियों से कथा, भक्ति परंपरा का पालन
पुंडरीक गोस्वामी एक ऐसे परिवार से आते हैं जो पांच पीढ़ियों से कथा, भक्ति और आध्यात्मिक परंपरा का पालन कर रहा है। उनके दादा अतुल कृष्ण गोस्वामी महाराज और पिता श्रीभूति कृष्ण गोस्वामी दोनों ही वैश्विक स्तर पर कथावाचन कर चुके हैं। 20 जुलाई 1988 को वृंदावन में जन्मे पुंडरीक बचपन से ही भक्ति के वातावरण में पले-बढ़े। 7 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक भागवत कथा सुनाई, जिसने उनके अध्यात्मिक भविष्य की दिशा तय कर दी। वृंदावन और दिल्ली में पढ़ाई के बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा भी हासिल की, लेकिन बाद में पूरी तरह कथावाचन और आध्यात्मिक सेवा में लग गए।
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युवाओं के बीच भी बेहद लोकप्रिय
उनकी प्रवचन शैली उन्हें युवाओं के बीच भी बेहद लोकप्रिय बनाती है। सरल भाषा, गहरी आध्यात्मिक समझ और आधुनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों के कारण उनकी कथाएं हर आयु वर्ग को आकर्षित करती हैं। श्रीमद्भागवत, गीता और चैतन्य चरितामृत जैसे ग्रंथों को वे बेहद सहज तरीके से समझाते हैं। 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘माधव गौरेश्वर वैष्णव पीठ’ की जिम्मेदारी संभाली और तब से भारत ही नहीं, विदेशों में भी प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय गोपाल क्लब की स्थापना कर युवाओं को मानसिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन देने का अभियान शुरू किया।
युवाओं के जीवन को सही दिशा
पुंडरीक गोस्वामी मानते हैं कि आध्यात्मिकता सिर्फ बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि युवाओं के जीवन को सही दिशा देने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। वे मानव सेवा को ही भगवान की सच्ची सेवा मानते हैं। गरीबों की मदद, भोजन वितरण, ध्यान शिविर और चैरिटी जैसे कार्यों में वे सक्रिय रहते हैं। जालंधर और अमृतसर में उन्होंने मंदिरों की स्थापना करवाकर भक्ति केंद्रों का विस्तार किया है। उनका कहना है कि भक्ति, ध्यान और सेवा ही जीवन में मानसिक शांति का वास्तविक मार्ग हैं। वे बताते हैं कि जब व्यक्ति भगवान की लीलाओं में मन लगाता है, तब जीवन की जटिलताएं स्वयं सरल हो जाती हैं।