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Alaska talks: अमेरिका के अलास्का में हुई डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की बहुप्रतीक्षित मुलाकात दुनिया भर में सुर्खियों में रही। युद्धविराम की उम्मीदों के बीच आयोजित यह समिट अंततः किसी ठोस नतीजे के बिना खत्म हुई। दोनों नेता मुस्कुराते और हाथ मिलाते दिखाई दिए, लेकिन असल मुद्दों पर कोई प्रगति नहीं हुई। पूरी दुनिया ने पूरी रात इस वार्ता से किसी बड़े फैसले की आस लगाई थी, मगर सुबह होते-होते साफ हो गया कि यह बैठक महज़ कूटनीतिक दिखावे से आगे नहीं बढ़ सकी।
पुतिन की रणनीतिक जीत
हालांकि कोई समझौता नहीं हुआ, लेकिन पुतिन इस मुलाकात से विजेता बनकर लौटे। अमेरिकी जमीन पर उनका रेड कार्पेट स्वागत और ट्रंप द्वारा उन्हें ‘बीस्ट’ कार में बैठाकर ले जाना, रूसी राष्ट्रपति के लिए प्रतीकात्मक जीत साबित हुआ। पश्चिम लंबे समय से रूस को अंतरराष्ट्रीय मंचों से अलग-थलग करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन इस मुलाकात ने उस आइसोलेशन को तोड़ दिया। पुतिन बिना कोई रियायत दिए फिर से वैश्विक डिप्लोमेसी की टेबल पर आ गए। रूस की मीडिया और नेताओं ने इसे कूटनीतिक सफलता बताया, जबकि यूरोपीय देश और यूक्रेन इसे अपने लिए खतरे का संकेत मान रहे हैं।
ट्रंप की मुश्किल और यूरोप की चिंता
दूसरी ओर, ट्रंप ने भले ही इस मुलाकात को ‘10 में 10’ बताया हो, लेकिन उनकी ‘सबसे बड़े डीलमेकर’ की छवि को धक्का पहुंचा। चुनाव प्रचार में उन्होंने 24 घंटे में युद्ध खत्म कराने का वादा किया था, मगर अलास्का समिट ने उनकी सीमाएं उजागर कर दीं। यूक्रेन और यूरोपीय देश चिंतित हैं कि कहीं यह वार्ता रूस के कब्जाए गए इलाकों पर समझौते की राह न खोल दे। वहीं पुतिन का धैर्य और लंबा खेल खेलना, ट्रंप की जल्दी परिणाम पाने की चाहत पर भारी पड़ा। यही कारण है कि इस समिट के बाद पुतिन ‘जियोपॉलिटिक्स के पापा’ कहे जा रहे हैं, जबकि ट्रंप को खाली हाथ लौटना पड़ा।