पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख की कामना करने वाले दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण होता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से संतान प्राप्ति, संतान की दीर्घायु और परिवार में सुख-शांति का आशीर्वाद मिलता है। यही कारण है कि हर वर्ष पौष माह में आने वाली इस एकादशी को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है।
कंफ्यूजन करें दूर
पंचांग के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का घट रही है जिस कारण पुत्रदा एकादशी का व्रत दशमी तिथि यानी 30 दिसंबर की सुबह 7: 51 से शुरू हो जाएगा. 30 दिसंबर को पारिवारिक जीवन जीने वाले लोग इस व्रत को करके भगवान विष्णु का संपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं. 1 जनवरी 2026 की तड़के 1:47 पर एकादशी व्रत का समापन हो जाएगा. 31 दिसंबर यानी साल के आखिरी दिन यह खास व्रत वैष्णव संप्रदाय के साधु संतों द्वारा किया जाएगा.
तिथि को लेकर भ्रम क्यों?
पुत्रदा एकादशी 2025 को लेकर लोगों में असमंजस इसलिए बना हुआ है क्योंकि पंचांगों में तिथि को लेकर थोड़ा अंतर देखने को मिलता है। हरिद्वार के विद्वान पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत हमेशा उदया तिथि के आधार पर रखा जाता है, न कि केवल तिथि के आरंभ के अनुसार। पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी जनवरी 2025 में पड़ रही है, लेकिन अलग-अलग पंचांगों में तिथि के आरंभ और समाप्ति समय के कारण भ्रम की स्थिति बन जाती है। ऐसे में उदया तिथि को मान्य करना ही शास्त्रसम्मत माना गया है।
हरिद्वार के पंडित के अनुसार व्रत का सही तरीका
हरिद्वार के ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक पुत्रदा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन व्रती को सात्विक आहार और संयम का पालन करना चाहिए। व्रत के प्रमुख नियम इस प्रकार बताए गए हैं:
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप
एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण
द्वादशी के दिन पारण करना
पुत्रदा एकादशी व्रत से मिलने वाले लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान संबंधी बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत न केवल संतान सुख देता है, बल्कि परिवार में सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान विष्णु अवश्य स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि हरिद्वार सहित देशभर के तीर्थ क्षेत्रों में इस एकादशी का विशेष महत्व है।