
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर सियासी और कानूनी हंगामा दोनों जारी है। सुप्रीम कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने दो व्यक्तियों को पेश किया। इनका दावा था कि SIR प्रक्रिया के बाद जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में उन्हें 'मृत' घोषित कर दिया गया है। योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के कारण बिहार में 65 लाख से ज़्यादा मतदाता प्रभावित हुए हैं और राज्य में मतदाता पंजीकरण दर 97% से घटकर 88% रह गई है। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे "टीवी स्टूडियो का ड्रामा" बताया। आयोग ने कहा कि अगर कोई गलती हुई है, तो उसे ऑनलाइन फॉर्म भरकर सुधारा जा सकता है। आयोग के वकील ने कहा कि योगेंद्र यादव को लोगों को कोर्ट में लाने के बजाय उनके आवेदन डिजिटल रूप से अपलोड करने चाहिए, ताकि मामले की जांच हो सके।
नागरिकता की जांच करने का अधिकार है
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस सूर्य कांत कर रहे थे, ने इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाई। पीठ ने कहा कि यह गर्व की बात है कि नागरिक अपनी बात रखने के लिए अदालत में आ रहे हैं। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग के पास किसी की नागरिकता की जांच करने का अधिकार है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि आधार कार्ड को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता है।
65 लाख लोगों के नाम बिना किसी उचित जांच के हटा दिए गए
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया से बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि 65 लाख लोगों के नाम बिना किसी उचित जांच के हटा दिए गए हैं। सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने मृत या पलायन कर चुके मतदाताओं के बारे में कोई सर्वे नहीं कराया है। वहीं, वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि आयोग ने हटाए गए मतदाताओं की सूची सार्वजनिक नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल दोनों पक्षों को सुना है। चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने या हटाने के लिए 30 अगस्त तक का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई बुधवार यानी 13 अगस्त को भी जारी रहेगी।