Radha Ashtami Vrat Katha: राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रिय माना जाता है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु राधा रानी की पूजा करते हैं और उनके निमित्त व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी की आराधना से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। विवाह में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए भी कई लोग इस दिन व्रत और पूजा करते हैं। राधा अष्टमी की पूजा में व्रत कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा भी है। मान्यता है कि कथा के पाठ के साथ पूजा का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। राधा रानी के जन्म और उनके पृथ्वी लोक पर आने से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी प्रचलित है। आइए जानते हैं यह कथा।
राधा रानी को क्यों मिला पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, गोलोक धाम में श्रीकृष्ण और राधा रानी दिव्य लीलाएं किया करते थे। एक प्रसंग में बताया जाता है कि किसी कारण राधा रानी कुछ समय के लिए गोलोक से दूर थीं। इसी दौरान श्रीकृष्ण सखी विरजा के साथ समय बिता रहे थे। जब राधा रानी को इसकी जानकारी मिली तो वे नाराज होकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचीं। वहां उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की। राधा रानी को इस तरह क्रोधित देखकर श्रीकृष्ण के सखा श्रीदामा को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने राधा रानी के व्यवहार पर आपत्ति जताई और आवेश में आकर उन्हें श्राप दे दिया कि उन्हें गोलोक छोड़कर पृथ्वी लोक पर जन्म लेना पड़ेगा।
राधा रानी और श्रीदामा ने एक-दूसरे को दिया श्राप
श्रीदामा के श्राप से राधा रानी भी क्रोधित हो गईं। कथा के अनुसार, उन्होंने श्रीदामा को भी श्राप दिया कि उन्हें राक्षस योनि में जन्म लेना होगा और अंत में अपने कर्मों के कारण मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। पौराणिक कथाओं में आगे बताया गया है कि श्रीदामा ने बाद में शंखचूड़ नाम के राक्षस के रूप में जन्म लिया। वह भगवान विष्णु का भक्त बताया जाता है। बाद में भगवान शिव के हाथों उसका वध हुआ। वहीं, इस घटना से दुखी होकर सखी विरजा वहां से चली गईं। मान्यता है कि बाद में उन्होंने नदी का रूप धारण कर लिया।
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वृषभानु के घर हुआ राधा रानी का जन्म
कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने राधा रानी को समझाया कि अब उन्हें पृथ्वी लोक पर जाना होगा। उन्होंने बताया कि राधा रानी वृषभानु जी और माता कीर्ति के घर पुत्री के रूप में जन्म लेंगी। पृथ्वी पर उनकी लीला में श्रीकृष्ण के साथ मिलन और विरह दोनों का अनुभव जुड़ा रहेगा। इसके बाद योगमाया के कीर्ति देवी के गर्भ में प्रवेश करने की कथा मिलती है। उचित समय आने पर राधा रानी ने कन्या रूप में जन्म लिया। इस तरह वे वृषभानु जी की पुत्री बनकर ब्रज क्षेत्र में पली-बढ़ीं। धार्मिक परंपरा में राधा रानी के इसी अवतरण को राधा अष्टमी के पर्व से जोड़ा जाता है।
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