मध्यप्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन पचमढ़ी में मंगलवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव की कैबिनेट की विशेष डेस्टिनेशन बैठक आयोजित की गई है। खास बात यह है कि यह ऐतिहासिक बैठक वीर आदिवासी राजा भभूत सिंह की स्मृति को समर्पित की गई है, जिन्होंने 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ साहसिक संघर्ष किया था। राजा भभूत सिंह को 'नर्मदांचल का शिवाजी' कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने गोरिल्ला युद्ध में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। तीन वर्षों तक जंगलों में रहकर उन्होंने अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला और कई लड़ाइयाँ जीतीं। उनकी रणनीति और नेतृत्व आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। उनके सम्मान में मंत्रिमंडल की यह बैठक पचमढ़ी के ऐतिहासिक महत्व को पुनर्जीवित करने की एक अनोखी पहल मानी जा रही है।
कौन थे राजा भभूत सिंह?
राजा भभूत सिंह गोंड जनजाति के वीर राजा थे, जिनका साम्राज्य जबलपुर और सतपुड़ा की पहाड़ियों तक फैला हुआ था। वे हर्राकोट राईखेड़ी की शाखा के जागीरदार परिवार से थे। अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बीज उनके दिल में तब पड़ा, जब उनके दादा मोहन सिंह ठाकुर ने नागपुर में पेशवा भोंसले के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया था।
तात्या टोपे के साथी और गोरिल्ला युद्ध के उस्ताद
भभूत सिंह ने 1857 की क्रांति में तात्या टोपे का साथ दिया और गोरिल्ला युद्ध में अपनी महारत दिखाई। वे पचमढ़ी के जंगलों, पहाड़ियों और देनवा घाटी के मार्गों से भलीभांति परिचित थे। यही वजह थी कि अंग्रेजों की सैन्य टुकड़ियां भी उनका सामना करने से डरती थीं।
शिवभक्त और वैद्य भी थे राजा भभूत सिंह
राजा भभूत सिंह केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि शिवभक्त और आयुर्वेदिक चिकित्सा के जानकार भी थे। उन्होंने कई शिव मंदिरों, कुंडों और धार्मिक स्थलों का निर्माण करवाया। घायल सैनिकों की वे स्वयं जड़ी-बूटियों से देखभाल करते थे।
देनवा घाटी की लड़ाई और गिरफ्तारी
राजा भभूत सिंह द्वारा लड़ी गई देनवा घाटी की लड़ाई अंग्रेजों के खिलाफ सबसे निर्णायक मानी जाती है। उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों को मद्रास इन्फैंट्री बुलानी पड़ी। लेकिन 1860 में गद्दारों की मदद से अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
आज भी जीवित हैं उनके निशान
पचमढ़ी और मढ़ई के जंगलों में आज भी राजा भभूत सिंह के किले, औजार निर्माण की भट्टियां और अन्य अवशेष मौजूद हैं, जो उनकी युद्ध कौशल और संगठन शक्ति का प्रमाण हैं। कैबिनेट की बैठक इसी विरासत को नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास है।