राजस्थान में बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए सरकार ने इस बार ऐसा कदम उठाया है, जो सीधे शादी के मंडप तक निगरानी पहुंचा देगा। आखातीज और पीपल पूर्णिमा जैसे ‘अबूझ सावों’ पर होने वाले बाल विवाह को रोकने के लिए अब शादी के कार्ड पर ही दूल्हा-दुल्हन की जन्मतिथि छापना जरूरी किया जा रहा है। इस नए नियम से प्रशासन को मौके पर ही उम्र की सच्चाई पकड़ने का रास्ता मिल जाएगा।
कार्ड पर जन्मतिथि: अब छुपेगी नहीं उम्र की सच्चाई
राजस्थान सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि शादी का निमंत्रण पत्र अब सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि कानूनी दस्तावेज की तरह काम करेगा। दूल्हा-दुल्हन की जन्मतिथि छापने से उनकी उम्र का सत्यापन आसान होगा। अब तक बाल विवाह में उम्र छिपाकर रस्में पूरी कर ली जाती थीं, लेकिन इस कदम से ‘पहले ही सुराग’ मिल जाएगा और कानून तुरंत सक्रिय हो सकेगा।
24 घंटे निगरानी: हर गांव पर प्रशासन की नजर
सरकार ने संवेदनशील तारीखों पर 24 घंटे मॉनिटरिंग का सिस्टम लागू किया है। गांव-गांव में अधिकारियों को अलर्ट मोड पर रखा गया है, ताकि किसी भी संदिग्ध शादी की जानकारी तुरंत मिल सके। हेल्पलाइन नंबर 181 और 100 भी जारी किए गए हैं, जिससे आम लोग भी सीधे सूचना देकर कार्रवाई का हिस्सा बन सकें। यह पूरी व्यवस्था एक तरह से ‘नेटवर्क सर्विलांस’ की तरह काम करेगी।
अबूझ साव: जहां सबसे ज्यादा होता है उल्लंघन
अक्षय तृतीया और पीपल पूर्णिमा जैसे अवसरों पर ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में शादियां होती हैं। इन्हीं दिनों बाल विवाह के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं। प्रशासन मानता है कि इन ‘शुभ मुहूर्तों’ की आड़ में कानून को दरकिनार किया जाता है, इसलिए इस बार खासतौर पर इन तारीखों को टारगेट किया गया है।
कानून का जाल: हर सहयोगी भी जिम्मेदार
बाल विवाह रोकने के लिए लागू विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के तहत अब सिर्फ परिवार ही नहीं, बल्कि शादी से जुड़े हर व्यक्ति को जिम्मेदार बनाया गया है। टेंट वाले, हलवाई, पंडित, बैंड और ट्रांसपोर्टर—सभी को चेतावनी दी गई है कि अगर वे बाल विवाह में शामिल पाए गए, तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी। यानी अब यह अपराध ‘नेटवर्क क्राइम’ की तरह देखा जाएगा।
सख्ती का संदेश: परंपरा बनाम कानून की जंग
सरकार का यह कदम साफ दिखाता है कि अब परंपरा के नाम पर कानून तोड़ना आसान नहीं होगा। बाल विवाह जैसी प्रथा पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन ने हर स्तर पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। हालांकि, यह देखना अहम होगा कि जमीनी स्तर पर इस सख्ती का कितना असर होता है और क्या वाकई इस बार ‘अबूझ साव’ बाल विवाह से मुक्त हो पाएंगे।