देशभर में दशहरे पर जहां रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है, वहीं मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में सदियों से बिल्कुल उलटी परंपरा देखने को मिलती है। यहां दशहरे के दिन रावण दहन नहीं, बल्कि रावण और उसके भाई कुंभकर्ण की पूजा की जाती है। ग्रामीणों का मानना है कि रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था और उसकी पूजा से हर मनोकामना पूरी होती है। इस विश्वास के कारण यहां दूर-दूर से लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं।
सदियों पुरानी रावण प्रतिमा पर चढ़ती है आस्था
भाटखेड़ी गांव से आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे गुजरता है, जहां रावण और कुंभकर्ण की सीमेंट की प्राचीन प्रतिमाएं बनी हुई हैं। ग्रामीणों को यह नहीं पता कि ये प्रतिमाएं कब और किसने बनवाई, लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी यहां पूजा का सिलसिला चलता आ रहा है। दशहरे पर आसपास के गांवों से सैकड़ों लोग यहां पहुंचते हैं और पूजन-हवन में शामिल होते हैं।
मन्नत पूरी होने का है विश्वास
ग्रामीणों का कहना है कि परीक्षाओं में सफलता से लेकर नौकरी लगने तक की मनोकामनाएं यहां मन्नत मांगने से पूरी होती हैं। गांव के एक युवक को एयरफोर्स में नौकरी मिली, जिसे वह रावण की प्रतिमा के आशीर्वाद का परिणाम मानता है। मन्नत पूरी होने के बाद लोग दोबारा यहां आकर रावण और कुंभकर्ण की प्रतिमा के सामने पूजा करते हैं।
रामलीला का मंचन, पर रावण दहन नहीं
नवरात्रि के नौ दिनों तक गांव के लोग खुद रामलीला का मंचन करते हैं, लेकिन दशहरे पर रावण दहन की जगह रावण की प्रतिमा की पूजा कर कार्यक्रम का समापन करते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वजों से चली आ रही है और आने वाली पीढ़ियां भी इसे आगे बढ़ा रही हैं।
शिवभक्ति के कारण पूजनीय रावण
ग्रामीणों के अनुसार रावण ने सीता हरण सिर्फ इसलिए किया ताकि भगवान राम के हाथों मोक्ष पा सके। भगवान शिव के प्रति उसकी गहरी भक्ति के कारण ही यहां उसे पूजनीय माना जाता है। इस अनोखी आस्था को देखने हर साल दशहरे पर बड़ी संख्या में लोग भाटखेड़ी गांव पहुंचते हैं।