जबलपुर में आयोजित चतुर्थ विश्व रामायण सम्मेलन केवल धार्मिक विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्र और संस्कृति से जुड़े बड़े विचारों का मंच बन गया। इस आयोजन में स्वामी रामभद्राचार्य ने रामायण को राष्ट्रग्रंथ घोषित करने की मांग कर वैचारिक बहस को नई दिशा दी। सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की मौजूदगी ने कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया।
विश्व रामायण सम्मेलन का भव्य शुभारंभ
जबलपुर के मानस भवन सभागार में चतुर्थ विश्व रामायण सम्मेलन का दीप प्रज्वलन के साथ शुभारंभ हुआ। चित्रकूट स्थित तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने संयुक्त रूप से आयोजन की शुरुआत की। यह सम्मेलन रामायण के सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व पर केंद्रित रहा।
रामायण को राष्ट्रग्रंथ घोषित करने की मांग
स्वामी रामभद्राचार्य ने मंच से कहा कि राम केवल एक आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना हैं। उन्होंने ‘रा’ को राष्ट्र और ‘म’ को मंगल बताते हुए कहा कि रामायण तभी सही अर्थों में वैश्विक बनेगी, जब इसे संसद में राष्ट्रग्रंथ का दर्जा दिया जाए। उनके इस वक्तव्य ने सम्मेलन में मौजूद विद्वानों और श्रोताओं के बीच गहन चर्चा को जन्म दिया।
‘ऊं शांति’ से ‘ऊं क्रांति’ तक का संदेश
स्वामी रामभद्राचार्य ने हालिया पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे समय में केवल शांति की बात पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सशक्त प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि अब ‘ऊं क्रांति’ का उद्घोष होना चाहिए। उन्होंने रामायण के सुंदरकांड की एक पंक्ति का उदाहरण देते हुए धर्म और न्याय के आधार पर कठोर निर्णय की बात कही।
सनातन परंपरा का वैश्विक पुनर्स्थापन
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि सनातन संस्कृति आज नए दृष्टिकोण के साथ विश्व मंच पर स्थापित हो रही है। उन्होंने कहा कि रामायण केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है। सम्मेलन को उन्होंने इस दिशा में एक प्रेरक कदम बताया और इसके विस्तार को राष्ट्रीय स्वरूप देने का आह्वान किया।
रामायण से मिलते हैं जीवन के उत्तर: मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन हर परिस्थिति में मार्गदर्शन देता है। उन्होंने राम के सामाजिक समरसता के संदेश को रेखांकित करते हुए कहा कि कठिन समय में रामायण का स्मरण व्यक्ति को सही दिशा दिखाता है। उन्होंने जबलपुर की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए इसे संस्कारों की भूमि बताया।
राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक हस्तियों की उपस्थिति
उद्घाटन समारोह में संत, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए। मंच पर मौजूद वक्ताओं ने रामायण के मूल्यों को समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने पर बल दिया।