रणजी ट्रॉफी में पंजाब के खिलाफ मुकाबले में सौराष्ट्र को अपने स्टार खिलाड़ी रवींद्र जडेजा से बड़ी पारी की उम्मीद थी। राजकोट के निरंजन शाह मैदान पर जडेजा जैसे ही बल्लेबाजी करने उतरे, लगा कि वह टीम को संकट से बाहर निकालेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। जडेजा सिर्फ सात रन बनाकर पवेलियन लौट गए। वह महज छह गेंद ही खेल पाए और सत्रहवें ओवर में जस इंदर की शानदार गेंद पर आउट हो गए।
सौराष्ट्र की पूरी बल्लेबाजी रही नाकाम
सौराष्ट्र की टीम पहले बल्लेबाजी करने उतरी थी, लेकिन शुरुआत से ही विकेट गिरने लगे। सलामी बल्लेबाज चिराग जानी सिर्फ आठ रन बनाकर आउट हो गए। इसके बाद हार्विक देसाई तेरह रन ही जोड़ सके। वसावडा तो महज दो रन पर पवेलियन लौट गए। पांचवें नंबर पर उतरे रवींद्र जडेजा से टीम को सहारा मिलने की उम्मीद थी, लेकिन वह भी जल्दी आउट हो गए। नतीजा यह रहा कि सौराष्ट्र की पूरी टीम पहली पारी में सैंतालीस ओवर में एक सौ बहत्तर रन पर सिमट गई।
हरप्रीत बराड़ का घातक स्पेल
पंजाब की ओर से बाएं हाथ के स्पिनर हरप्रीत बराड़ ने राजकोट की पिच पर कहर बरपाया। उन्होंने सौराष्ट्र के बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का कोई मौका नहीं दिया। हरप्रीत ने प्रेरक मांकड, कोटक, जय गोहिल, पार्थ भुत, धर्मेंद्र जडेजा और हार्विक देसाई को आउट किया। उन्होंने सिर्फ अड़तीस रन देकर छह विकेट झटके। उनकी गेंदबाजी इतनी सटीक थी कि सौराष्ट्र के बल्लेबाज रन बनाने के लिए तरसते नजर आए।
डॉट गेंदों से बांधा दबाव
हरप्रीत बराड़ ने सिर्फ विकेट ही नहीं लिए, बल्कि अपनी कसी हुई गेंदबाजी से दबाव भी बनाया। उनकी करीब अस्सी प्रतिशत गेंदें बिना रन के रहीं। इस वजह से बल्लेबाजों पर दबाव बढ़ता गया और विकेट गिरते चले गए। राजकोट की पिच पर उन्होंने धैर्य और अनुशासन के साथ गेंदबाजी की, जिसका सौराष्ट्र के पास कोई जवाब नहीं था।
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संघर्ष से भरा हरप्रीत का सफर
हरप्रीत बराड़ की यह कामयाबी आसान नहीं रही। आज वह पंजाब के प्रमुख गेंदबाज हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन्हें रणजी टीम में जगह पाने के लिए सात बार निराशा झेलनी पड़ी थी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने खेल पर मेहनत करते रहे।
छोटा करियर, बड़ी छाप
यह हरप्रीत बराड़ का सिर्फ तीसरा प्रथम श्रेणी मुकाबला था, लेकिन चार पारियों में ही उन्होंने चौदह विकेट अपने नाम कर लिए हैं। यह उनके करियर का पहला पांच विकेट प्रदर्शन रहा और अब तक का सर्वश्रेष्ठ भी। आम तौर पर उन्हें छोटे प्रारूप का विशेषज्ञ माना जाता है, लेकिन रणजी ट्रॉफी में इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि वह लंबे प्रारूप में भी मैच का रुख बदलने की काबिलियत रखते हैं।