
मेरठ का ऐतिहासिक बाबा बिल्वेश्वर नाथ मंदिर जिसे रामायण काल से जोड़ा जाता है इन दिनों विवादों के घेरे में है. मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आती थीं. लेकिन, इस धार्मिक धरोहर पर कब्जे और आयोजन को लेकर दो पक्षों में तनाव चरम पर है. 29 अगस्त 2025 को होने वाले बलदेव बाबा की छठ महोत्सव से पहले विवाद इतना बढ़ा कि पुलिस को मंदिर परिसर में फोर्स तैनात करनी पड़ी. बता दें कि पंडित शास्त्री गणेश ज्योतिषी का दावा है कि उनके पूर्वज पीढ़ियों से मंदिर में पूजा करते आए हैं इसलिए मंदिर का संचालन पुजारियों का हक है. दूसरी ओर गणेश अग्रवाल और पवन गर्ग का कहना है कि मंदिर समाज का है और आयोजन समाज के दान से होते हैं. उनका तर्क है कि पुजारियों का काम सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित है न कि चंदे या प्रबंधन पर कब्जा करना. यह मतभेद बलदेव बाबा की छठी के आयोजन को लेकर खुलकर सामने आया.
प्रशासन ने संभाला मोर्चा
विवाद बढ़ने पर जिला प्रशासन और पुलिस ने हस्तक्षेप किया. सीओ कैंट नवीन शुक्ला और SDM की मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच प्रसाद वितरण के लिए समझौता हुआ. फिर भी 29 अगस्त को होने वाले आयोजन के दौरान शांति बनाए रखने के लिए मंदिर के बाहर पुलिस तैनात रहेगी. प्रशासन का कहना है कि धार्मिक स्थल की गरिमा को किसी भी कीमत पर ठेस नहीं पहुंचने दी जाएगी.
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प्राचीन है मंदिर का इतिहास
बता दें कि कथाओं के अनुसार मेरठ (पुराना नाम मयराष्ट्र) मंदोदरी के पिता मय दानव की नगरी थी. मंदोदरी इस मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग की पूजा करती थीं. मान्यता है कि शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उनकी रावण से विवाह की इच्छा पूरी की. मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं भी है जिसके जल से शिवलिंग का अभिषेक होता था. मराठा काल में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और इसका नाम बिल्व वृक्षों के कारण बिल्वेश्वर नाथ पड़ा. मंदिर का सात सुरों वाला पीतल का घंटा और बद्रीनाथ जैसा मुख्य द्वार भी भक्तों को आकर्षित करता है. सावन में हजारों भक्त यहां जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए आते हैं. मान्यता है कि 40 दिन तक दीपक जलाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. लेकिन कब्जे का विवाद इस धरोहर की गरिमा को प्रभावित कर रहा है.