Ravivar ke Upay: हिंदू धर्म में सप्ताह के हर दिन का अपना खास महत्व माना गया है। रविवार का दिन सूर्यदेव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की पूजा करने से जीवन में ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही अच्छे स्वास्थ्य और मान-सम्मान की प्राप्ति भी होती है। धार्मिक मान्यताओं में सूर्य को तेज, शक्ति और सफलता का प्रतीक माना गया है। यही वजह है कि रविवार को सूर्यदेव की पूजा करना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इससे नौकरी और कारोबार से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं और तरक्की के नए रास्ते खुल सकते हैं। सूर्यदेव की कृपा से व्यक्ति को कामकाज में सफलता के साथ समाज में प्रतिष्ठा भी मिलती है।
आदित्य हृदय स्तोत्र का करें पाठ
रविवार की पूजा में आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ भी विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से मन को मजबूती मिलती है और जीवन में सफलता के रास्ते खुलते हैं। इसे मनोकामना पूर्ति और आत्मबल बढ़ाने से भी जोड़ा जाता है।
ऐसे करें रविवार की पूजा
रविवार की सुबह सूर्योदय से पहले या उसके आसपास उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद किसी शांत स्थान पर खड़े होकर सूर्यदेव को जल चढ़ाएं। जल अर्पित करते समय सूर्यदेव का ध्यान करें और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें। पूजा पूरी करने के बाद आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार को इस तरह सूर्यदेव की आराधना करने से व्यक्ति में उत्साह और आत्मविश्वास बढ़ता है। नियमित रूप से पूजा-पाठ करने से करियर और कारोबार में उन्नति के लिए सकारात्मक परिस्थितियां बनने की भी मान्यता है।
यहां पढ़ें आदित्य हृदय स्तोत्र
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः
एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभिः
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यापां पतिः
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः
वायुर्वहिनः प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः
हरिदश्वः सहस्त्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहस्करो रविः
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः
आतपी मण्डली मृत्युः पिगंलः सर्वतापनः
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तःसर्वभवोद् भवः
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः
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याय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः
ज नमो नमः सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नमः
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः.
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे.
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभुः.
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।