RBI Repo Rate Hike : महंगाई, रुपये की कमजोरी और वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती उथल-पुथल के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ब्याज दर नीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। SBI रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए RBI दिसंबर 2026 तक रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट यानी 0.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी पर विचार करे। रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक अनिश्चितता और विदेशी पूंजी के प्रवाह में उतार-चढ़ाव से भारत जैसे उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, यह SBI रिसर्च की सिफारिश है, RBI का घोषित फैसला नहीं।
रेपो रेट बढ़ाने की सलाह क्यों
SBI रिसर्च की 9 अक्टूबर की Ecowrap रिपोर्ट में वैश्विक महंगाई, सरकारी बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव, वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर चिंताओं और अमेरिकी ब्याज दरों से जुड़ी बदलती उम्मीदों का उल्लेख किया गया है। इन कारणों से वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव पड़ सकता है। रिपोर्ट का तर्क है कि ऐसी स्थिति में पूंजी की लागत बढ़ने और विदेशी निवेश के प्रवाह में अनिश्चितता आने का जोखिम रहता है। इसी वजह से ब्याज दरों को लेकर अधिक सक्रिय रणनीति अपनाने का सुझाव दिया गया है।
लिक्विडिटी पर भी बदलाव का सुझाव
रिपोर्ट में केवल रेपो रेट बढ़ाने की बात नहीं कही गई है। SBI रिसर्च ने सीमित अवधि के लिए लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) कॉरिडोर को 50 बेसिस पॉइंट तक चौड़ा करने का प्रस्ताव भी दिया है। इसके तहत RBI अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट व्यवस्था में नीतिगत रेपो रेट से अलग कुछ दरों को समायोजित करने पर विचार कर सकता है। रिपोर्ट में 2013 के टेपर टैंट्रम और 2020 के कोविड-19 संकट के दौरान केंद्रीय बैंक की कार्रवाइयों का भी संदर्भ दिया गया है।
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महंगाई पर लगाम या महंगे होंगे लोन
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित करने और मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता मजबूत करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। रेपो रेट बढ़ने पर होम लोन, कार लोन और कारोबार के लिए कर्ज की लागत बढ़ सकती है, खासकर उन कर्जों पर जिनकी ब्याज दरें नीतिगत दरों से जुड़ी हैं। इससे परिवारों के खर्च, कंपनियों के निवेश और नई लोन मांग पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए RBI को महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।
GDP ग्रोथ पर SBI का अनुमान
SBI रिसर्च को उम्मीद है कि भारत की आर्थिक विकास दर मजबूत बनी रह सकती है और संभावित रूप से 7.5 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है। रिपोर्ट में विदेशी मुद्रा प्रबंधन को मजबूत करने और लोन तथा इक्विटी बाजारों में दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित करने के लिए भी कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट पर क्या फैसला होगा, यह अभी तय नहीं है। RBI वैश्विक परिस्थितियों, महंगाई, आर्थिक विकास और घरेलू वित्तीय स्थिरता के आंकड़ों का आकलन करके निर्णय लेगा।