
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। यह समय आध्यात्मिक साधना, व्रत और भक्ति के लिए उत्तम होता है। खासतौर पर सावन के सोमवारों का विशेष महत्व होता है, लेकिन यदि इस माह का अंतिम शनिवार हो, तो यह और भी विशेष फलदायी माना जाता है। ऐसे शुभ संयोग में यदि श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त उपासना की जाए, तो भक्तों को न केवल दुर्भाग्य से मुक्ति मिलती है, बल्कि जीवन में सुख-शांति, धन और समृद्धि का भी आगमन होता है।
माना जाता है न्याय का देवता
शनि देव को न्याय का देवता माना गया है, जो हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। वहीं भगवान शिव को 'भोलेनाथ' कहा जाता है, जो थोड़ी सी भक्ति से ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों को वरदान दे देते हैं। जब सावन के अंतिम शनिवार को दोनों की पूजा एक साथ की जाए, तो यह एक अद्भुत और प्रभावशाली आध्यात्मिक योग बनता है।
क्या करना रहेगा शुभ
इस विशेष अवसर पर यदि "शिव चालीसा" या "शिव तांडव स्तोत्र" का पाठ किया जाए, साथ ही शनिदेव के "शनि स्तोत्र" या "दशनाम शनि स्तुति" का उच्चारण किया जाए, तो यह साधना विशेष फलदायी सिद्ध होती है। इससे न केवल शनि की ढैय्या और साढ़े साती के प्रभाव कम होते हैं, बल्कि जीवन की बाधाएं भी दूर होती हैं।पूजा विधि में सबसे पहले प्रातः स्नान कर साफ वस्त्र पहनें और शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, दूध, शहद आदि अर्पित करें।
ये करें अर्पण
इसके बाद शनिदेव को काले तिल, सरसों का तेल, नीला फूल और काला वस्त्र अर्पित करें। शाम के समय दीपक जलाकर शनि मंत्र "ॐ शं शनैश्चराय नमः" का 108 बार जाप करें। यह साधना न केवल मानसिक शांति देती है, बल्कि आर्थिक संकटों से छुटकारा दिलाकर घर में सुख-समृद्धि लाती है। इसलिए इस सावन के अंतिम शनिवार को यह पुण्य अवसर न गंवाएं और भोलेनाथ तथा शनिदेव की कृपा प्राप्त करें।