Relief For UP Government: उत्तर प्रदेश में कथित अवैध गिरफ्तारी से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मुआवजे के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह स्वीकार किया गया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे। मामले ने गिरफ्तारी प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने स्वीकार किया कि संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की लिखित जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने अदालत से कहा कि सरकार इस तथ्य से इनकार नहीं कर रही है, लेकिन उसकी आपत्ति केवल हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए मुआवजे की राशि को लेकर है। सरकार ने यह भी बताया कि मामले में संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया जा चुका है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा मामला
यह मामला मनोज कुमार द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने अपनी गिरफ्तारी को गैर-कानूनी बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि गिरफ्तारी के दौरान उन्हें संविधान और न्यायालयों द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए गए, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
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हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी को माना था अवैध
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया था कि गिरफ्तारी मेमो में केवल केस नंबर का उल्लेख था, जबकि गिरफ्तारी के स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किए गए थे। अदालत ने इसे गंभीर प्रक्रिया संबंधी चूक मानते हुए गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि गलत तरीके से हिरासत में रखने के लिए मुआवजा क्यों न दिया जाए।
अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य के गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि मामले में दाखिल जवाब संतोषजनक नहीं है और इससे प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता की कमी दिखाई देती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की आगे की सुनवाई के लिए रास्ता खुला रखा है। अब सभी की नजरें शीर्ष अदालत के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं।