धर्म आस्था : हरिद्वार, जिसे देवभूमि का द्वार कहा जाता है, केवल गंगा स्नान और तीर्थयात्रा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह अनेक शक्तियों और रहस्यमयी साधनाओं का भी स्थल है। यहां एक ऐसा प्राचीन स्थान है जहां भक्तगण ‘रौद्र रूप’ की विशेष पूजा करके अपने जीवन के संकटों से मुक्ति पाने का मार्ग खोजते हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस पूजन को करता है, उसे न केवल मुकदमों, शत्रुओं और विवादों से छुटकारा मिलता है, बल्कि जीवन में स्थिरता, साहस और आत्मबल भी प्राप्त होता है।
आराधना करती है रक्षा
यह पूजा भगवान भैरव या काली के उग्र स्वरूप को समर्पित होती है। कहा जाता है कि जब व्यक्ति अन्याय, झूठे आरोप या शत्रुता के जाल में फँस जाता है, तब इस रौद्र रूप की आराधना उसकी रक्षा करती है। यह पूजा व्यक्ति के भीतर नकारात्मकता को नष्ट कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस प्रकार की साधना केवल योग्य गुरु या पुरोहित के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए, क्योंकि यह अत्यंत शक्तिशाली और फलदायी होती है।
पूजा की विधि और महत्व
प्रातःकाल या मध्य रात्रि के समय, स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने के बाद भक्त भगवान के रौद्र रूप की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक जलाकर विशेष मंत्रों का जाप करते हैं। इसमें काले तिल, नींबू, लौंग और सरसों के तेल का प्रयोग किया जाता है। इस पूजा के दौरान “ॐ कालभैरवाय नमः” या “ॐ ह्रीं क्रीं कालिकायै नमः” मंत्र का 108 बार जाप अत्यंत फलदायी माना गया है।
शुभ मुहूर्त
कार्तिक अमावस्या, भैरव अष्टमी, और मंगलवार या शनिवार की मध्य रात्रि को यह पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। हरिद्वार के कई प्राचीन मंदिरों, जैसे कि कालभैरव मंदिर और दक्षेश्वर महादेव परिसर, में इस दिन विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
आस्था और अनुभव
स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि इस पूजा से न केवल जीवन के झंझट और मुकदमे शांत होते हैं, बल्कि व्यक्ति के मन से भय और क्रोध भी दूर हो जाता है। यह आराधना शक्ति और शांति, दोनों का अद्भुत संगम है — जहां रौद्रता में भी करुणा का संदेश छिपा है। हरिद्वार की यह अनोखी परंपरा हमें यह सिखाती है कि जब जीवन के संकट असहनीय लगें, तब आस्था और साधना ही सच्चा समाधान बन सकती है।