दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर होते रुपये के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया है। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार करते हैं, लेकिन इस बार आरबीआई ने अलग रणनीति अपनाई है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास की गति बनाए रखते हुए मूल्य स्थिरता को संतुलित रखना है।
महंगाई फिलहाल नियंत्रण में
आरबीआई के फैसले की सबसे बड़ी वजह देश में नियंत्रित खुदरा महंगाई है। अप्रैल 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति घटकर 3.48 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो केंद्रीय बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है। पिछले कई महीनों से महंगाई इसी दायरे में बनी हुई है। जब तक उपभोक्ता कीमतों पर गंभीर दबाव नहीं दिखता, तब तक ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत कम महसूस होती है।
आर्थिक विकास को नहीं देना चाहता झटका
केंद्रीय बैंक का मानना है कि मौजूदा समय में आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देना भी उतना ही जरूरी है जितना महंगाई पर नियंत्रण रखना। यदि ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती, तो कर्ज महंगा हो जाता और निवेश तथा उपभोग पर असर पड़ सकता था। इसलिए आरबीआई ने फिलहाल विकास को प्राथमिकता देते हुए दरों को स्थिर बनाए रखने का विकल्प चुना है।
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अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति
एशिया के कई देशों में महंगाई का दबाव भारत की तुलना में अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। यही कारण है कि आरबीआई को तत्काल सख्त मौद्रिक नीति अपनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। केंद्रीय बैंक ने फिलहाल हालात पर नजर रखने और आगे की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने का रास्ता चुना है।
रुपये को संभालने के लिए दूसरी रणनीति
रुपये में गिरावट जरूर दर्ज की गई है, लेकिन आरबीआई ने इसे नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों के बजाय विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का सहारा लिया है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर केंद्रीय बैंक बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाकर रुपये पर दबाव कम करने की कोशिश कर रहा है। इससे ब्याज दर बढ़ाने की आवश्यकता कम हो गई।
बाहरी जोखिमों का असर अभी सीमित
हालांकि पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और रुपया भी कमजोर हुआ है, लेकिन नीति निर्माताओं का आकलन है कि इसका पूरा असर अभी घरेलू उपभोक्ता कीमतों पर नहीं पहुंचा है। इसी वजह से आरबीआई ने जल्दबाजी में कदम उठाने के बजाय स्थिति का इंतजार करने और आगे के आर्थिक संकेतकों पर नजर रखने का फैसला किया है। फिलहाल केंद्रीय बैंक का मानना है कि अर्थव्यवस्था इन बाहरी चुनौतियों का सामना करने की स्थिति में है।