मध्य
प्रदेश के जबलपुर जिले
की पाटन तहसील में
एक धार्मिक ट्रस्ट द्वारा प्रस्तावित आवासीय परियोजना को रेरा ने
दोबारा खारिज कर दिया है।
श्री शंकरजी महाराज ट्रस्ट ने वर्ष 2023 में
इस प्रोजेक्ट को "श्रीशंकरजी निवास" नाम से पंजीकृत
कराने के लिए आवेदन
किया था, जो पहले भी रद्द हो चुका था। इसके बाद ट्रस्ट ने हाईकोर्ट में अपील की, जहां से रेरा को पुनर्विचार के निर्देश मिले थे। पुनः जांच में सामने आया कि जिस भूमि पर हाउसिंग प्रोजेक्ट बनाया जा रहा है, वह जमीन किसी आम ट्रस्ट की नहीं बल्कि मंदिर की है,
जिसका स्वामित्व स्वयं भगवान शंकर को माना गया है। रेरा ने साफ किया कि इस भूमि पर न तो ट्रस्ट का कानूनी स्वामित्व है और न ही सार्वजनिक न्यास रेरा अधिनियम के अंतर्गत "व्यक्ति" की परिभाषा में आता है। 1954-55 से यह ज़मीन श्री शंकरजी मंदिर के
स्वामित्व में है और धार्मिक उद्देश्य के लिए आरक्षित मानी जाती है। इसलिए इस पर आवासीय कॉलोनी बसाकर बिक्री की अनुमति नहीं दी जा सकती। ट्रस्ट जरूरी दस्तावेज पेश करने में भी असफल रहा, जिससे रेरा को आवेदन को फिर से अस्वीकार करना पड़ा।
मामला धार्मिक आस्था और जमीन के कानूनी अधिकार से जुड़ा है, जिससे प्रशासन भी विशेष संवेदनशीलता के साथ निपट रहा है।
जमीन पर मालिकाना हक नहीं साबित कर सका ट्रस्ट
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की पाटन तहसील में श्री शंकरजी महाराज ट्रस्ट द्वारा प्रस्तावित आवासीय परियोजना को रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) ने एक बार फिर खारिज कर दिया है। वर्ष 2023 में इस ट्रस्ट ने "श्रीशंकरजी निवास" नाम से प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन दिया था, जिसे पहले भी रद्द कर दिया गया था। ट्रस्ट ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। कोर्ट ने रेरा को आवेदन पर पुनर्विचार के निर्देश दिए, लेकिन पुनः जांच में यह स्पष्ट हो गया कि भूमि का मालिकाना हक ट्रस्ट के पास नहीं बल्कि मंदिर और उसके आराध्य भगवान शंकर के पास है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद रेरा ने दोबारा की सुनवाई
हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद रेरा ने ट्रस्ट को नोटिस जारी कर उनसे आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा। खासतौर पर यह पूछा गया कि ट्रस्ट को यह जमीन कैसे प्राप्त हुई, लेकिन ट्रस्ट के पास इसका कोई प्रमाण या वैध दस्तावेज नहीं था। इसके चलते दोबारा सुनवाई में भी रजिस्ट्रेशन को स्वीकृति नहीं मिल सकी।
रेरा ने माना– यह जमीन भगवान शंकर के स्वत्व की है
रेरा की जांच में यह सामने आया कि वर्ष 1954-55 से यह भूमि श्री शंकरजी मंदिर के नाम पर दर्ज है और इसका स्वत्व मंदिर के आराध्य देव भगवान शंकर के नाम है। ऐसे में इस भूमि पर किसी भी प्रकार का आवासीय निर्माण या प्लॉटिंग करना धार्मिक भावनाओं और कानून दोनों के खिलाफ होगा।
रेरा
एक्ट में सार्वजनिक न्यास
को "व्यक्ति" नहीं माना गया
रेरा अधिनियम में किसी भू-संपदा परियोजना के पंजीयन के लिए "व्यक्ति" की परिभाषा स्पष्ट की गई है, जिसमें सार्वजनिक न्यास (पब्लिक ट्रस्ट) को शामिल नहीं किया गया है। यही कारण है कि ट्रस्ट, इस एक्ट के अंतर्गत परियोजना का रजिस्ट्रेशन नहीं करवा सकता।
श्रीशंकरजी
निवास योजना को दूसरी बार
झटका
श्रीशंकरजी निवास नाम से प्रस्तावित इस आवासीय योजना को पहले 2023 में भी रद्द किया गया था। अब हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद, ट्रस्ट द्वारा ठोस दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाने के कारण यह परियोजना दोबारा खारिज कर दी गई है। रेरा ने स्पष्ट कहा है कि जमीन पर मालिकाना हक साबित न कर पाने के कारण आवेदन अमान्य है।
धार्मिक संपत्ति पर व्यवसायिक निर्माण को मंजूरी नहीं
रेरा ने आदेश में कहा कि धार्मिक संपत्तियों का उपयोग केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए। ऐसे स्थलों पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति देना न केवल विधिक रूप से अवैध है, बल्कि यह जनता की धार्मिक भावनाओं को भी आहत कर सकता है।
प्रशासनिक स्तर पर भी संवेदनशील मामला बना
यह मामला अब प्रशासनिक स्तर पर भी विशेष संवेदनशीलता के साथ देखा जा रहा है। चूंकि मामला मंदिर और भगवान शंकर से जुड़ी भूमि का है, इसलिए भविष्य में इस तरह की किसी भी परियोजना को अनुमति देने से पहले शासन और न्यायालय दोनों स्तरों पर कड़े मानकों के साथ विचार किया जाएगा।