वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और ऊर्जा कीमतों में तेजी का असर अब भारत की वित्तीय योजनाओं पर भी दिखाई देने लगा है। बढ़ती कीमतों के कारण सरकार का सब्सिडी खर्च लगातार बढ़ रहा है, जिससे राजकोषीय संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। इसी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार बजट के कुछ हिस्सों में खर्च कम करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ समय से लगातार उच्चस्तरीय बैठकें हो रही हैं।
वित्त मंत्रालय में कई दौर की चर्चा
सूत्रों के अनुसार, पिछले एक महीने के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ हुई कई बैठकों में संभावित खर्च कटौती के विकल्पों पर चर्चा की गई है। हालांकि अभी तक किसी अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं हुई है। जानकारी के मुताबिक सरकार पूंजीगत व्यय और रक्षा बजट में कटौती करने के पक्ष में नहीं दिख रही है। इसके बजाय जल संसाधन परियोजनाओं और राज्यों को दिए जाने वाले कुछ ऋण आवंटनों जैसे क्षेत्रों की समीक्षा की जा रही है, जहां खर्च कम करने की गुंजाइश तलाश की जा सकती है।
राजकोषीय घाटे पर बढ़ रहा दबाव
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखना कठिन हो सकता है। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष के पहले महीने अप्रैल में राजकोषीय घाटा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना होकर 3.6 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया। सरकारी खर्च में वृद्धि और अपेक्षाकृत कम राजस्व प्राप्ति इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
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उधारी बढ़ाने से भी बचना चाहती है सरकार
बढ़ते घाटे की भरपाई के लिए सरकार के सामने अतिरिक्त उधार लेने का विकल्प मौजूद है, लेकिन अधिकारी इस रास्ते को लेकर सतर्क हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार तय सीमा से अधिक उधारी लेती है तो बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है और वित्तीय बाजारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही कारण है कि खर्च नियंत्रण और राजस्व प्रबंधन के विकल्पों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
राजनीतिक और आर्थिक दोनों चुनौतियां
खर्च में कटौती का कोई भी फैसला राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। यदि सामाजिक कल्याण योजनाओं या राज्यों को मिलने वाले संसाधनों पर असर पड़ता है तो इसका राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। वहीं, उर्वरक सब्सिडी जैसे मदों में बढ़ते खर्च ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। फिलहाल अधिकारी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक हालात का फिर से आकलन किए जाने की संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में राहत नहीं मिलती तो केवल खर्च कटौती के उपाय राजकोषीय दबाव को पूरी तरह कम करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे।