भोपाल में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में अंतरराष्ट्रीय कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना भगवान शिव से करते हुए एक अहम संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जैसे शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए विष पिया, वैसे ही संघ राष्ट्रहित में आरोपों का विष पीकर कार्य करता है। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक एकता और सद्भाव पर विस्तार से विचार रखे।
सामाजिक सद्भाव के मंच पर जुटे विचार
शनिवार को भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में देशभर से आए स्वयंसेवकों और प्रबुद्धजनों की उपस्थिति रही। इस अवसर पर पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र और समाज की रक्षा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करना ही सच्ची साधना है।
संघ और शिव-तत्व की तुलना
पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि भगवान शिव सृष्टि की रक्षा के लिए विषपान करते हैं, उसी तरह संघ के स्वयंसेवक भी प्रतिदिन आलोचनाओं और आरोपों का विष सहकर राष्ट्र सेवा में लगे रहते हैं। उनके अनुसार, यह शिव-भाव ही संघ की कार्यशैली की आत्मा है, जिसमें त्याग, तपस्या और सेवा प्रमुख हैं।
विविधता में एकता ही भारतीय पहचान
कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू समाज मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर संघर्ष नहीं करता, बल्कि सह-अस्तित्व को स्वीकार करता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति सदियों से मजबूत बनी हुई है।
सद्भाव से चलता है समाज
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़ने और चलाने का कार्य केवल सद्भाव करता है। उन्होंने बताया कि भारतीय ऋषि-मुनियों की साधना और तपस्या ने ही इस राष्ट्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नींव रखी, जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के सुख की कल्पना की गई है।
राष्ट्र के प्रति आत्ममंथन का संदेश
पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने संबोधन में यह प्रश्न भी रखा कि प्रत्येक नागरिक को आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने राष्ट्र को क्या दिया। उन्होंने कहा कि केवल अधिकारों की बात नहीं, बल्कि कर्तव्यों का निर्वहन ही समाज को मजबूत बनाता है।