मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 92.42 के स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बल्कि वैश्विक हालात का सीधा असर है। अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ने से निवेशकों में डर बना हुआ है, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है।
तेल की कीमतों ने डाला बड़ा दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह बन रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे व्यापार घाटा बढ़ता है और रुपये पर दबाव बनता है। यही कारण है कि तेल की हर बढ़त सीधे मुद्रा को प्रभावित कर रही है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी
रुपये की गिरावट के पीछे विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना भी बड़ी वजह है। हाल के दिनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से भारी रकम निकाली है। इससे बाजार में गिरावट आई और रुपये की स्थिति और कमजोर हो गई। निवेशकों की सतर्कता और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति इस गिरावट को और तेज कर रही है।
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डॉलर की मजबूती बनी चुनौती
अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी रुपये के लिए मुश्किल खड़ी कर रही है। डॉलर इंडेक्स में बढ़त से यह साफ है कि निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर को चुन रहे हैं। जब डॉलर मजबूत होता है, तो बाकी देशों की मुद्रा पर दबाव बढ़ जाता है। यही वजह है कि रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही है।
एक्सपर्ट ने दी मिली-जुली राय
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में हालात कुछ सामान्य होते हैं और तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो रुपये को थोड़ी राहत मिल सकती है। वहीं केंद्रीय बैंक भी बाजार में हस्तक्षेप कर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा है, ताकि ज्यादा उतार-चढ़ाव से बचा जा सके।
आगे के संकेतों पर टिकी उम्मीद
आने वाले दिनों में रुपये की चाल पूरी तरह वैश्विक घटनाओं पर निर्भर करेगी। अगर तनाव कम होता है तो स्थिति सुधर सकती है, लेकिन अगर जंग और बढ़ती है तो दबाव और गहरा सकता है। फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और निवेशक हर अपडेट पर नजर रखे हुए हैं।