भारतीय रुपया पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 के पार पहुंच गया है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का संकेत है। 30 मार्च को रुपया 95.58 के स्तर पर पहुंचकर नया रिकॉर्ड लो बना गया। वैश्विक तनाव, महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली ने इसे एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बना दिया है। इसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला है।
रुपया क्यों हुआ इतना कमजोर?
रुपए में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% तेल आयात करता है, जिसके लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया लगातार कमजोर होता चला गया।
युद्ध और वैश्विक संकट का असर
Strait of Hormuz जैसे अहम समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने से पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर खतरा मंडरा रहा है। Iran और Israel के बीच टकराव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और निवेशकों का भरोसा डगमगा गया।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव
मार्च महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजार से भारी रकम निकाली है। करीब 12 अरब डॉलर से ज्यादा की बिकवाली ने बाजार में दबाव बढ़ा दिया। निवेशक सुरक्षित विकल्प जैसे अमेरिकी बॉन्ड्स की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, जिससे भारतीय मुद्रा पर सीधा असर पड़ा है।
तेल के बढ़ते दाम और महंगाई का खतरा
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ रुपया ही नहीं बल्कि आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिससे ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ेगा और इसका असर खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा के सामान तक पर दिखाई देगा। साथ ही मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोना-चांदी जैसे आयातित सामान भी महंगे हो जाएंगे।
आगे क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें काबू में नहीं आतीं और वैश्विक तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपया दबाव में बना रहेगा। हालांकि, Reserve Bank of India द्वारा उठाए गए कदम कुछ हद तक बाजार को स्थिर कर सकते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में तुरंत राहत मिलना मुश्किल दिख रहा है।