भारतीय रुपये में उतार-चढ़ाव का दौर लगातार बना हुआ है। हालिया दिनों में रिकॉर्ड निचले स्तर से थोड़ी रिकवरी के बाद उम्मीद जगी थी कि रुपये को सहारा मिलेगा, लेकिन हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन की शुरुआत के साथ ही फिर गिरावट देखने को मिली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 23 पैसे टूटकर 89.94 के स्तर पर पहुंच गया। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, घरेलू शेयर बाजारों में कमजोरी और वैश्विक अनिश्चितताओं ने एक बार फिर रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है।
कारोबार की शुरुआत में क्यों टूटा रुपया
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले 89.84 पर खुला, लेकिन शुरुआती कारोबार में ही दबाव में आ गया और 89.94 तक फिसल गया। यह पिछले बंद भाव की तुलना में 23 पैसे की गिरावट है। इससे पहले बुधवार को रुपया 8 पैसे कमजोर होकर 89.71 पर बंद हुआ था, जबकि गुरुवार को क्रिसमस के कारण बाजार बंद रहे। इस दौरान वैश्विक स्तर पर डॉलर में मामूली कमजोरी रही, लेकिन इसका फायदा रुपये को नहीं मिल सका।
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कच्चा तेल और विदेशी बिकवाली का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड वायदा 0.16 प्रतिशत की तेजी के साथ 62.34 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जिससे आयातकों पर दबाव बढ़ा। साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी रुपये को कमजोर किया है। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने बुधवार को 1,721 करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेचे हैं। इससे घरेलू बाजारों में नकारात्मक माहौल बना और निवेशकों की धारणा कमजोर हुई, जिसका सीधा असर रुपये की चाल पर पड़ा है।
विशेषज्ञों ने क्या दी वजह?
जानकारों का मानना है कि रुपये पर दबाव का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और विदेशी पूंजी की लगातार निकासी है। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ शोध विश्लेषक दिलीप परमार के मुताबिक, साल के अंत से पहले विदेशी निवेशकों की बिकवाली और सर्राफा व आयातकों की ओर से डॉलर की बढ़ी हुई मांग ने रुपये को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि आरबीआई द्वारा डॉलर-रुपया स्वैप और खुले बाजार परिचालन के ऐलान के बावजूद बाजार में खास राहत नहीं दिखी, क्योंकि ये कदम डॉलर की मांग और आपूर्ति के अंतर को तुरंत कम करने में प्रभावी साबित नहीं हो पाए।