भारतीय रुपया इस समय लगातार दबाव में है और 19 मई 2026 को डॉलर के मुकाबले 96.52 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच गया। साल की शुरुआत में रुपया करीब 89 के आसपास था, लेकिन कुछ ही महीनों में इसमें 6 से 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। लगातार गिरते रुपये ने बाजार, निवेशकों और आम लोगों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
गिरावट के पीछे क्या वजह
इस कमजोरी के पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 105 से 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ा और डॉलर की मांग तेज हो गई। साथ ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़ी निकासी भी की है।
100 के पार जाने वाले क्या कह रहे
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि रुपये की मौजूदा हालत चिंता बढ़ाने वाली है। अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा का कहना है कि अगर मौजूदा हालात जारी रहे तो रुपया आसानी से 100 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है। मुद्रा विशेषज्ञ के.एन. डे ने भी माना कि बाजार में जिस तेजी से गिरावट आई है, उससे 100 का मनोवैज्ञानिक स्तर अब असंभव नहीं दिखता।
ये भी पढ़ें : Delhi-NCR में थम सकते हैं ट्रक, 3 दिन के चक्का जाम से बढ़ी टेंशन
दूसरा पक्ष क्या सोचता है
दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। वित्त विश्लेषक धीरज निम का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को इतनी तेजी से 100 तक नहीं जाने देगा। बार्कलेज के विशेषज्ञ मितुल कोटेचा भी मानते हैं कि गिरावट उम्मीद से ज्यादा तेज जरूर रही है, लेकिन उनके अनुमान में अभी 100 का स्तर शामिल नहीं है।
बीच का रास्ता भी सामने
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के निलेश शाह का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि एक दिन रुपया तीन अंकों में पहुंच सकता है, लेकिन असली चिंता यह नहीं कि रुपया गिरेगा या नहीं, बल्कि यह है कि गिरावट किस रफ्तार से होती है। अगर गिरावट नियंत्रित और धीरे-धीरे होती है तो इसे अर्थव्यवस्था के लिए सामान्य माना जा सकता है।
अब सबकी नजर RBI पर
आने वाले समय में तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया की स्थिति और विदेशी निवेशकों का रुख सबसे अहम रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक के पास लगभग 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो रुपये को बड़ी गिरावट से बचाने में मदद कर सकता है। फिलहाल एक्सपर्ट्स की राय अलग-अलग है, लेकिन इतना तय है कि अगले कुछ महीने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम और चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं।