पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका टकराव के बीच वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारतीय रुपया अब सिर्फ अमेरिकी डॉलर ही नहीं, बल्कि चीनी युआन के मुकाबले भी कमजोर हो गया है। जनवरी 2026 से अब तक रुपया युआन के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत तक टूट चुका है। इससे चीन से आने वाला सामान और ज्यादा महंगा हो गया है, जिसका असर आम लोगों की जेब तक पहुंचने लगा है।
भारत पर क्यों भारी पड़ रहा संकट?
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत और चीन के बीच लगातार बढ़ता ट्रेड डेफिसिट इसकी सबसे बड़ी वजह है। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने चीन से करीब 115 से 120 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात सिर्फ 14.5 अरब डॉलर के आसपास रहा। यानी भारत चीन पर भारी आयात निर्भरता से जूझ रहा है। दूसरी तरफ चीनी युआन इस साल डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ है, जबकि भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है।
कच्चे तेल और विदेशी निवेश ने बढ़ाई मुश्किल
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब बनी हुई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से इम्पोर्ट बिल तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से भारी बिकवाली की है। रिपोर्ट्स के अनुसार 2026 में अब तक करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये विदेशी निवेश बाजार से निकल चुका है, जिससे रुपये पर और दबाव बढ़ गया।
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चीनी सामान हुआ 10% तक महंगा
पहले जहां 1 चीनी युआन की कीमत करीब 12.8 से 13 रुपये थी, अब यह बढ़कर 14 से 14.2 रुपये तक पहुंच गई है। इसका मतलब यह है कि भारतीय कंपनियों और आयातकों को अब चीन से सामान खरीदने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर उपकरण और मशीनरी जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। अनुमान है कि सिर्फ युआन के मुकाबले रुपये की गिरावट से भारत पर करीब 80 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ चुका है।
चीन को कैसे मिल रहा फायदा?
रुपये की कमजोरी और युआन की मजबूती से चीन को बड़ा फायदा हो रहा है। भारत पहले से ही चीन से भारी मात्रा में सामान खरीदता है और अब महंगे युआन की वजह से चीन की कमाई और बढ़ रही है। भारत फिलहाल चीन पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, क्योंकि कई बड़े उद्योग चीनी इनपुट्स पर टिके हुए हैं।
RBI और सरकार क्या कर रही है?
स्थिति को संभालने के लिए RBI और केंद्र सरकार कई रणनीतिक कदम उठा रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने के लिए NRI डिपॉजिट नियम आसान बनाने की तैयारी चल रही है। इसके अलावा विदेशी निवेश आकर्षित करने और डॉलर-युआन पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। लेकिन अगर वैश्विक तनाव और तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहीं, तो आने वाले समय में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।