दुनिया की नजरों से दूर, रात के अंधेरे में समुद्र के बीचोंबीच तेल का एक बड़ा खेल चल रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर सख्त प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन इसके बावजूद रूस का तेल वैश्विक बाजार तक पहुंच रहा है। अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया है ताकि रूस से तेल खरीद रोकी जा सके, फिर भी रूस भारत के लिए क्रूड का बड़ा सप्लायर बना हुआ है। इसी बीच वेनेजुएला और ईरान पर भी दबाव बढ़ा है, जिससे शैडो फ्लीट एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
क्या है शैडो फ्लीट का नेटवर्क
शैडो फ्लीट या डार्क फ्लीट असल में पुराने तेल टैंकरों का एक ऐसा नेटवर्क है, जो प्रतिबंधित तेल की ढुलाई करता है। इन जहाजों पर फर्जी झंडे लगाए जाते हैं, नाम बदले जाते हैं और लोकेशन छिपाने के लिए जीपीएस तक बंद कर दिया जाता है। कई बार समुद्र के बीच जहाज से जहाज में तेल ट्रांसफर किया जाता है, ताकि यह पता न चले कि तेल कहां से आया। अनुमान है कि यह फ्लीट दुनिया की कुल टैंकर क्षमता का करीब 18.5 प्रतिशत है।
रूस सबसे बड़ा खिलाड़ी क्यों बना
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने इस डार्क फ्लीट को तेजी से बढ़ाया। 2022 में जहां ऐसे जहाज 100 से भी कम थे, वहीं 2025 के अंत तक इनकी संख्या 3300 से ज्यादा हो चुकी है। रूस के बाल्टिक और ब्लैक सी बंदरगाहों से तेल लेकर ये जहाज एशिया की ओर जाते हैं। माना जाता है कि इससे रूस को हर साल अरबों डॉलर की कमाई हो रही है, जिससे पश्चिमी प्रतिबंधों का असर काफी हद तक कमजोर पड़ गया है।
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कितना बड़ा हो चुका है यह कारोबार
रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते साल इस डार्क फ्लीट ने करीब 100 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल ट्रांसपोर्ट किया, जो ग्लोबल ऑयल फ्लो का 6 से 7 प्रतिशत है। सिंगापुर और मलेशिया के आसपास इन जहाजों की गतिविधियां सबसे ज्यादा देखी गई हैं। यहां रात के समय तेल की अदला बदली होती है, जिससे सुरक्षा और पर्यावरण दोनों को खतरा रहता है।
भारत और चीन की भूमिका क्या है
रूस और ईरान इस प्रतिबंधित तेल के बड़े विक्रेता हैं, जबकि भारत और चीन इसके सबसे बड़े खरीदार माने जाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2025 के आखिरी महीनों में भारत और चीन ने अपने करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की खरीद शैडो फ्लीट के जरिए की। भारत में हालांकि अमेरिकी दबाव के बाद रूसी तेल का हिस्सा घटा है, लेकिन अब भी रूस एक अहम सप्लायर बना हुआ है।
अमेरिका क्यों नहीं रोक पा रहा खेल
अमेरिका और उसके सहयोगी सैकड़ों जहाजों और कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, फिर भी यह नेटवर्क मजबूत बना हुआ है। इसकी वजह है जटिल मालिकाना ढांचा, शेल कंपनियां और समुद्र में तेल मिलाने जैसे तरीके। जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि भू-राजनीति का भी खेल है, जिसमें भारत और चीन को सस्ता तेल मिल रहा है और अमेरिका चाहकर भी पूरी तरह रोक नहीं पा रहा।