यूरोपीय संघ के व्यापार आयुक्त मारोस सेफकोविक ने स्पष्ट कर दिया है कि अब रूस पर लगे तेल प्रतिबंधों में आगे कोई नई ढील नहीं दी जाएगी। यह बयान स्कॉट बेसेंट के साथ हुई अहम बैठक के बाद सामने आया। उन्होंने कहा कि पहले दी गई छूट केवल अस्थायी थी और कुछ कमजोर देशों की जरूरतों को देखते हुए दी गई थी।
क्यों दी गई थी अस्थायी छूट
हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने रूसी तेल की बिक्री और लोडिंग के लिए जारी विशेष अनुमति को 16 मई तक बढ़ाया था। यह कदम उस समय उठाया गया जब होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही थी। कई गरीब और आयात पर निर्भर देशों के सामने ऊर्जा संकट गहरा गया था, इसलिए यह राहत दी गई।
मिडिल ईस्ट तनाव का सीधा असर
ईरान और अन्य खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल सप्लाई को झटका दिया है। एशियाई देशों को इसका सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा है। सेफकोविक ने साफ कहा कि भविष्य में ऐसी ढील दोबारा नहीं मिलेगी और अब बाजार को सख्त नियमों के साथ आगे बढ़ना होगा।
उर्वरक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
तेल के साथ-साथ उर्वरक की सप्लाई भी बड़ी चिंता बन गई है। यूरोप और अफ्रीका में इसकी कमी को गंभीर बताया गया है। बेसेंट ने जी20 और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की है कि गरीब देशों तक उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, वरना कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
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भारत के लिए क्यों बढ़ा खतरा
भारत अपनी जरूरत का लगभग 30 से 35 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आयात करता है। अगर रूसी तेल पर सख्ती और बढ़ती है, तो भारत के लिए ऊर्जा संकट गहरा सकता है। खाड़ी देशों से आने वाला तेल भी होर्मुज जलडमरूमध्य के कारण जोखिम में है। ऐसे में विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
महंगे विकल्प और बढ़ती लागत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अफ्रीका, अमेरिका या अन्य देशों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जो रूस की तुलना में काफी महंगा होगा। इससे न सिर्फ पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, बल्कि खेती और उद्योग की लागत भी बढ़ेगी।
आने वाले समय में बढ़ेगा दबाव
वैश्विक स्तर पर तेल और उर्वरक दोनों की सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका और यूरोप का सख्त रुख यह संकेत देता है कि आने वाले महीनों में बाजार और अस्थिर हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की संभावना है।