देश की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को एक बार फिर रूसी कच्चा तेल मिलने जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक महीने के अंतराल के बाद जामनगर रिफाइनरी में रूसी तेल की नई खेप पहुंचेगी। इससे पहले रिलायंस को आखिरी बार दिसंबर में रूसी तेल मिला था। यह खबर ऐसे समय आई है, जब वैश्विक स्तर पर तेल खरीद को लेकर कई तरह के प्रतिबंध और दबाव बने हुए हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली अस्थायी राहत
सूत्रों के अनुसार, रिलायंस को अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी छूट मिली थी। इसी छूट के तहत कंपनी को प्रतिबंधित रूसी तेल उत्पादक रोसनेफ्ट से पुराने सौदे पूरे करने की अनुमति दी गई थी। बताया जा रहा है कि इसी प्रक्रिया के बाद अब दोबारा रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति शुरू हो रही है। यह छूट एक तय समय सीमा के लिए थी, जिसके चलते दिसंबर के बाद कुछ समय तक सप्लाई रुकी रही।
फरवरी और मार्च में पहुंचेगी नई खेप
रिपोर्ट में कहा गया है कि रूसी कच्चे तेल की खेप फरवरी और मार्च के दौरान जामनगर रिफाइनरी पहुंचेगी। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इन महीनों में कितने जहाजों के जरिए तेल आएगा। यह भी स्पष्ट नहीं है कि मार्च के बाद रिलायंस रूसी तेल की खरीद जारी रखेगी या नहीं। कंपनी की ओर से इस पर फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है जामनगर
मुकेश अंबानी की जामनगर रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स मानी जाती है। इसकी क्षमता करीब 14 लाख बैरल प्रतिदिन है। पहले रिलायंस रूस की रोसनेफ्ट कंपनी के साथ लंबे समय के समझौते के तहत रोजाना करीब पांच लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रही थी। अब नए सिरे से शुरू हो रही सप्लाई उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
मिडिल ईस्ट से भी बढ़ रहा आयात
हालांकि रिलायंस की वापसी के बावजूद भारत का कुल रूसी तेल आयात आने वाले महीनों में सीमित रह सकता है। इसकी वजह यह है कि कई भारतीय रिफाइनर कंपनियां अब मध्य पूर्व के देशों से तेल आयात बढ़ा रही हैं। वैश्विक हालात और प्रतिबंधों के कारण कंपनियां अपनी रणनीति में बदलाव कर रही हैं, ताकि अचानक सप्लाई रुकने का जोखिम कम हो।
रणनीति बदलने को मजबूर हुई कंपनियां
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बन गया था, क्योंकि यह सस्ते दामों पर मिल रहा था। लेकिन बार-बार बदलते प्रतिबंधों ने कंपनियों को सतर्क कर दिया है। रिलायंस के अधिकारियों का भी कहना है कि कई बार अचानक लगे प्रतिबंधों के चलते खरीद घटानी पड़ी। ऐसे में रूसी तेल के साथ-साथ अब दूसरे स्रोतों पर भी बराबर ध्यान दिया जा रहा है।