Sabarimala Case Debate: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और समुदायों के मौलिक अधिकारों को लेकर व्यापक बहस हुई। नौ जजों की संविधान पीठ के सामने पारसी, जैन और आदिवासी समुदायों की ओर से अलग-अलग दलीलें पेश की गईं। अदालत में यह सवाल प्रमुख रहा कि क्या धार्मिक अधिकारों के नाम पर ऐसे नियम बनाए जा सकते हैं जो दूसरे मौलिक अधिकारों को प्रभावित करें।
पारसी समुदाय ने रखी अपनी दलील
पारसी पंचायत की ओर से वरिष्ठ वकील निजाम पाशा ने कहा कि पारसी समुदाय में महिलाओं के खिलाफ किसी प्रकार का औपचारिक बहिष्कार नहीं होता। उन्होंने अदालत से कहा कि सामाजिक रिश्तों और व्यक्तिगत व्यवहार में न्यायालय सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इस दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का वास्तविक बहिष्कार होता है तो अदालत उस मामले पर विचार कर सकती है।
परंपराओं का दिया उदाहरण
सुनवाई के दौरान जैन समुदाय की ओर से कहा गया कि कई धार्मिक परंपराओं में प्रवेश और व्यवहार से जुड़े विशेष नियम होते हैं। उदाहरण के तौर पर महिला साध्वियों के कक्ष में पुरुषों का प्रवेश नहीं होता और पुरुष साधुओं से दूरी बनाए रखने की परंपरा है। वकीलों ने दलील दी कि यदि हर स्थिति में अनुच्छेद 14 और 21 को सर्वोच्च माना गया तो कई धार्मिक परंपराएं प्रभावित हो सकती हैं।
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धर्म की आड़ में अधिकार नहीं छीने जा सकते
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नाम पर किसी व्यक्ति के बुनियादी नागरिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। अदालत से कहा गया कि संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों से कोई भी समुदाय खुद को अलग नहीं कर सकता।
अधिकारों पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान आदिवासी समुदायों के पारंपरिक और सांस्कृतिक अधिकारों का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि प्रकृति की पूजा करने वाले समुदायों और अलग-थलग रहने वाली जनजातियों के धार्मिक अधिकारों को भी संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। अदालत से इन समुदायों के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की रक्षा करने की मांग की गई।