सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ऐसी दलीलें पेश कीं, जिन्होंने बहस को नया मोड़ दे दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने देशभर के अलग-अलग मंदिरों की परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक आस्थाओं में विविधता है और इन्हें एक ही पैमाने से नहीं तौला जा सकता। अदालत में उठे ये तर्क अब सामाजिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बन गए हैं।
सबरीमाला विवाद में केंद्र की नई दलील
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने सबरीमाला मामले पर अपनी बात रखते हुए कहा कि मंदिरों की परंपराएं अलग-अलग होती हैं और इन्हें समान नियमों में बांधना उचित नहीं है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कई धार्मिक स्थलों पर विशेष मान्यताओं के तहत कुछ वर्गों के प्रवेश पर सीमाएं तय हैं, जो आस्था का हिस्सा हैं, भेदभाव का नहीं।
देशभर के मंदिरों के उदाहरण से रखा पक्ष
केंद्र ने अपनी दलील को मजबूत करने के लिए राजस्थान के पुष्कर स्थित ब्रह्मा मंदिर, केरल के अत्तुकल मंदिर और असम के कामाख्या मंदिर जैसे उदाहरण दिए। बताया गया कि कुछ मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश सीमित है, तो कहीं महिलाओं के लिए विशेष आयोजन होते हैं। इन परंपराओं को धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में देखा जाना चाहिए।
जहां पुरुषों को ‘महिला बनकर’ जाना होता है मंदिर
केरल के कोत्तांकुलंगारा श्री देवी मंदिर का जिक्र करते हुए बताया गया कि यहां पुरुषों को मंदिर में प्रवेश के लिए महिलाओं की तरह साड़ी पहनकर और पूरा श्रृंगार करके जाना होता है। कई भक्त इसके लिए ब्यूटी पार्लर तक जाते हैं। यह आयोजन आस्था का हिस्सा है, जहां पुरुष खुद को देवी के प्रति समर्पित करने के लिए यह परंपरा निभाते हैं।
परंपरा बनाम समानता—कानूनी उलझन गहराई
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन इसके बाद से लगातार इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग उठती रही। 2019 में इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा गया, जहां अब धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन तलाशा जा रहा है।
आस्था की आड़ या संवैधानिक चुनौती?
यह मामला अब सिर्फ मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रहा है कि क्या परंपराओं के नाम पर किसी भी प्रकार की रोक जायज है। अदालत में उठे तर्क एक तरह से ‘धार्मिक नियमों की जांच’ जैसे हैं, जहां हर परंपरा को संवैधानिक कसौटी पर परखा जा रहा है। आने वाला फैसला देश में आस्था और अधिकारों की नई परिभाषा तय कर सकता है।