भोपाल के भारत भवन में 21 जून को आयोजित सदानीरा समागम के दूसरे दिन नदियों और जल संरक्षण को लेकर कला, साहित्य, नृत्य और सिनेमा के माध्यम से एक संवेदनशील अभिव्यक्ति देखने को मिली। जहां एक ओर अभिनेता, गीतकार और कवि पीयूष मिश्रा ने ‘नदी’ को माँ, स्मृति और संवेदना बताते हुए नदियों की प्रेमकथा को कविताओं में ढाला, वहीं दूसरी ओर सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. शमा भाटे ने जल-जगत की सूक्ष्म दुनिया को कथक की शैली में मंचित किया। इस अवसर पर प्रवाह फिल्म समारोह के तहत 10 से अधिक लघु फिल्मों का प्रदर्शन भी हुआ, जो नदियों और जल जीवन के संरक्षण पर केंद्रित रहीं।
नदियाँ केवल जल नहीं, संस्कृति का प्रवाह हैं : पीयूष मिश्रा
कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षण रहे पीयूष मिश्रा जिन्होंने ‘नदीनामा’ शीर्षक से हिन्दी साहित्य की चुनिंदा जल-केंद्रित कविताओं का पुनर्पाठ किया। निराला, पंत, अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल सहित कई कवियों की रचनाओं को उन्होंने भावनात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया।
पीयूष मिश्रा ने कहा—
“नदी केवल जल नहीं है, वह माँ है, संस्कृति है, संवेदना है। जब नदी बहती है, सभ्यता गाती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कविता और स्मृति को जीवित रखना है, तो सबसे पहले नदियों को जीवित रखना होगा।
निशब्द भेदा : कथक में जलचर जीवन की कथा
भारत भवन के अभिरंग सभागार में प्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. शमा भाटे की नृत्य प्रस्तुति निशब्द भेदा ने दर्शकों को जल के भीतर के जीव-जगत की संवेदनशील यात्रा पर ले जाया। इस नृत्य नाटिका में जल में बसे जीवों के संघर्ष, संवेदनाएं और पर्यावरणीय संकट को कथक के माध्यम से दर्शाया गया।
जल की तरलता, मत्स्यगति, जल के कंपन और जलजीवों की प्रतिक्रियाओं को प्रतीकात्मक नृत्य भाषा में दिखाया गया, जो परंपरा और आधुनिक संदर्भों का सशक्त संगम था।
प्रवाह फिल्म समारोह: जल पर केंद्रित सिनेमाई संवाद
सदानीरा समागम के अंतर्गत प्रवाह फिल्म समारोह में 10 से अधिक लघु फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। ये फिल्में नदियों की वर्तमान स्थिति, जल संकट, पर्यावरण परिवर्तन और जल-संरक्षण के मुद्दों पर आधारित थीं। कार्यक्रम में अनेक स्कूली छात्र, पर्यावरण प्रेमी, युवा और सिनेमा प्रेमी शामिल हुए।
फिल्म निर्देशक देवेंद्र खंडेलवाल ने कहा कि—
“जल चेतना जगाने के लिए फिल्म एक बेहद प्रभावी माध्यम बन सकता है।”
उन्होंने कार्यक्रम के आयोजन के लिए आयोजकों की सराहना भी की।