बिहार में सियासत ने नया मोड़ ले लिया है। सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नई सरकार की शुरुआत की। उनके साथ विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। यह पहली बार है जब भाजपा ने बिहार में ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बनाया है, जिनका शुरुआती राजनीतिक सफर पार्टी या संघ से नहीं जुड़ा रहा।
RJD से शुरू हुई सियासत
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर आरजेडी से शुरू हुआ था। वह राबड़ी देवी सरकार में मंत्री भी रहे। इसके बाद जेडीयू का दामन थामा और फिर 2017 में भाजपा में शामिल हो गए। महज कुछ वर्षों में उन्होंने पार्टी के भीतर मजबूत पकड़ बनाई और अब मुख्यमंत्री बनकर शीर्ष पद हासिल कर लिया।
भाजपा की नई रणनीति
सम्राट चौधरी अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्हें गैर-BJP बैकग्राउंड के बावजूद मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा ने अब तक कई ऐसे नेताओं को मौका दिया है, जिन्होंने अपनी सियासी पारी किसी और दल से शुरू की थी। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि क्षमता और जनाधार के आधार पर किसी को भी बड़ा मौका मिल सकता है।
असम में भी दिखा यही ट्रेंड
असम में हिमंत बिस्वा सरमा इसका बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने कांग्रेस से राजनीति शुरू की और बाद में भाजपा में शामिल होकर मुख्यमंत्री बने। इससे पहले सर्बानंद सोनोवाल भी दूसरे संगठन से आकर भाजपा में मुख्यमंत्री बने थे।
पूर्वोत्तर में भी प्रयोग सफल
मणिपुर में एन बीरेन सिंह और युमनाम खेमचंद सिंह, अरुणाचल में पेमा खांडू और गेगोंग अपांग जैसे नेताओं को भी भाजपा ने सत्ता सौंपी, जिनका मूल बैकग्राउंड पार्टी से अलग रहा है।
दक्षिण और पूर्व में भी उदाहरण
कर्नाटक में बसवराज बोम्मई और त्रिपुरा में माणिक साहा को भी इसी तरह मौका मिला। झारखंड में अर्जुन मुंडा और उत्तर प्रदेश में बृजेश पाठक जैसे नेताओं ने भी दूसरे दलों से आकर भाजपा में बड़ी पहचान बनाई।
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बदलती सियासत का संकेत
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि भारतीय राजनीति में अब दल बदलकर भी बड़े पद हासिल किए जा सकते हैं। भाजपा की यह रणनीति उसे नए चेहरों के जरिए विस्तार देने में मदद कर रही है।
आगे की राजनीति पर असर
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ बिहार की राजनीति ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा संकेत है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति कितनी सफल रहती है और अन्य राज्यों में इसका क्या असर पड़ता है।